श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
विदुरस्तदभिप्रेत्य धृतराष्ट्रमभाषत ।
राजन्निर्गम्यतां शीघ्रं पश्येदं भयमागतम् ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर:—महात्मा विदुर ने; तत्—वह; अभिप्रेत्य—ठीक से जानकर; धृतराष्ट्रम्—धृतराष्ट्र से; अभाषत—कहा; राजन्—हे राजा; निर्गम्यताम्—कृपा करके बाहर निकलें; शीघ्रम्—शीघ्र ही; पश्य—देखो; इदम्—इस; भयम्—भय को; आगतम्—पहले से आया हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 महात्मा विदुर यह सब जानते थे, अतएव उन्होंने धृतराष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कहा : हे राजन्, कृपा करके यहाँ से शीघ्र ही बाहर निकल चलिये। विलम्ब न कीजिये। जरा देखें तो, भय ने किस प्रकार आपको वशीभूत कर रखा है।
 
तात्पर्य
 क्रूर काल को किसी की परवाह नहीं रहती, चाहे वह धृतराष्ट्र हो या महाराज युधिष्ठिर ही क्यों न हों। अतएव बूढ़े धृतराष्ट्र को जो आध्यात्मिक उपदेश दिया गया, वह उनसे कम आयुवाले महाराज युधिष्ठिर पर भी लागू होता था। एक तरह से, राजमहल का प्रत्येक व्यक्ति, राजा तथा उनके भाइयों एवं माता सहित, विदुर के भाषणों को ध्यान से सुन रहा था। किन्तु विदुर को ज्ञात था कि उनके उपदेश विशेषकर धृतराष्ट्र के ही निमित्त हैं, क्योंकि वे अत्यधिक भौतिकतावादी थे। राजन् शब्द से धृतराष्ट्र को विशेष रूप से सम्बोधित किया गया है। धृतराष्ट्र अपने पिता के सबसे बड़े पुत्र थे, अतएव नियमों के अनुसार, उन्हें हस्तिनापुर के सिंहासन पर आरूढ़ होना था, किन्तु जन्मान्ध होने के कारण, वे अपने न्यायोचित अधिकार से अयोग्य मान लिए गये थे। वे इस शोकावस्था को भूल नहीं पाये, किन्तु अपने छोटे भाई पाण्डु की मृत्यु के बाद, यह निराशा कुछ कम हो गई। उनके छोटे भाई अपने पीछे कुछ अल्पवयस्क पुत्र छोड़ गये थे। अतएव धृतराष्ट्र उनके स्वाभाविक अभिभावक बन चुके थे, किन्तु उनकी हार्दिक अभिलाषा यह थी कि वे असली राजा बनें और अपना राज्य दुर्योधन आदि अपने पुत्रों को हस्तान्तरित कर दें। इन राजसी महत्त्वाकांक्षाओं को लेकर, धृतराष्ट्र राजा बनना चाह रहे थे, अतएव वे अपने साले शकुनी की सलाह से, सभी प्रकार के षड्यंत्र रच रहे थे। किन्तु भगवान् की इच्छा से सारी योजना असफल रही। वे अन्तिम अवस्था में भी अपना सब कुछ, सारे लोग तथा अपना सारा धन खोकर भी, राजा बने रहना चाहते थे, क्योंकि वे महाराज युधिष्ठिर के ताऊ जो थे। अपना कर्तव्य समझकर, महाराज युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र की राजसी प्रतिष्ठा को बनाये रखा और धृतराष्ट्र सुखपूर्वक राजा बने रहने, अथवा महाराज युधिष्ठर के राजसी ताऊ होने के भ्रम में अपने इने-गिने दिन काट रहे थे। विदुर धृतराष्ट्र के छोटे कर्तव्यनिष्ठ स्नेही भाई एवं एक साधु पुरूष होने के कारण, एक साधु पुरूष, उन्हें रोग तथा बुढ़ापे की नींद से जगाना चाह रहे थे। अतएव उन्होंने व्यंग्यपूर्वक धृतराष्ट्र को “राजन्” कहकर सम्बोधित किया जबकि वास्तव में वे राजा थे नहीं। हर व्यक्ति सनातन काल का दास है, अतएव कोई भी इस भौतिक जगत में राजा नहीं हो सकता। राजा का अर्थ है, वह जो आज्ञा दे सके। एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज राजा काल तथा ज्वार-भाटा को आदेश देना चाहता था, किन्तु काल तथा ज्वार भाटा ने उसकी आज्ञा का पालन करने से इनकार कर दिया। अतएव इस भौतिक जगत में मनुष्य मिथ्या का राजा होता है और धृतराष्ट्र को विशेष रूप से, उनके मिथ्या पद का तथा उन वास्तविक भयानक घटनाओं का, जो उस समय घट चुकी थीं, स्मरण दिलाया जा रहा था। विदुर ने उनसे तुरन्त ही इस अवस्था से बाहर निकल आने के लिए कहा, यदि वे तेजी से बढऩे वाली इस भयावह परिस्थिति से बचना चाह रहे हों। उन्होंने महाराज युधिष्ठिर से इस प्रकार नहीं कहा, क्योंकि उन्हें पता था कि महाराज युधिष्ठिर इस विकट संसार की भयावह परिस्थति से अवगत हैं और कालक्रम में वे स्वयं अपनी रक्षा कर सकेंगे, भले ही उस समय विदुर वहाँ उपस्थित न हों।
 
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