श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित्कर्हिचित्प्रभो ।
स एष भगवान् काल: सर्वेषां न: समागत: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
प्रतिक्रिया—उपचार; न—नहीं है; यस्य—जिसका; इह—इस भौतिक संसार में; कुतश्चित्—किसी प्रकार से भी; कर्हिचित्— या किसी के द्वारा; प्रभो—हे स्वामी; स:—वह; एष:—निश्चित रूप से; भगवान्—भगवान्; काल:—शाश्वत काल; सर्वेषाम्— सबों का; न:—हम सबका; समागत:—आया हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 इस भौतिक संसार में कोई भी व्यक्ति इस भयावह स्थिति का निराकरण नहीं कर सकता। हे स्वामी, शाश्वत काल के रूप में, पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् हम सबों के पास आ पहुँचे हैं।
 
तात्पर्य
 ऐसी कोई बेहतर शक्ति नहीं है, जो मृत्यु के क्रूर पंजे को रोक सके। किसी को चाहे कितना ही शारीरिक कष्ट क्यों न होता हो, तब भी कोई मरना नहीं चाहता। आज की तथाकथित ज्ञान की वैज्ञानिक प्रगति के समय में भी न तो बुढ़ापे का कोई उपचार है, न मृत्यु का। वृद्धावस्था क्रूर काल द्वारा दी गई मृत्यु के आगमन की सूचना है और कोई भी शाश्वत काल के बुलावे को या परम निर्णय को स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकता है। यह सब धृतराष्ट्र को बताया जा रहा है, क्योंकि हो सकता है कि वे विदुर से इस आसन्न भयावह स्थिति से निपटने के लिए कोई उपचार ढूँढ़ निकालने के लिए कहें, जैसाकि वे इसके पूर्व कई बार कह चुके थे। किन्तु आज्ञा देने के पूर्व, विदुर ने धृतराष्ट्र को सूचित किया कि इस जगत में इसका किसी के पास या किसी साधन से कोई उपचार प्राप्त नहीं हो सकता। और चूँकि इस भौतिक जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, अत: मृत्यु भगवान् से अभिन्न है जैसाकि स्वयं भगवान् ने भगवद्गीता (१०.३४) में कहा है।
इस भौतिक जगत में मृत्यु को न तो किसी के द्वारा, न ही किसी साधन से रोका जा सकता है। हिरण्यकशिपु अमर होना चाहता था और उसने उग्र तपस्या की थी, जिससे सारा संसार थरथरा रहा था और ब्रह्मा स्वयं उसे ऐसी उग्र तपस्या से विरत कराने के लिए उसके पास गये थे। हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से यह वर माँगा कि वह अमर हो जाय, किन्तु ब्रह्मा ने कहा कि वे स्वयं सर्वोच्च लोक में रहकर भी मृत्यु के अधीन हैं, अतएव वे उसे अमरत्व का वरदान कैसे दे सकते हैं? अत: इस ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च लोक में भी मृत्यु है। फिर अन्य लोकों के विषय में तो कहना ही क्या, जो गुणता में ब्रह्मा के आवास के ग्रह ब्रह्मलोक से कहीं निम्न कोटि के हैं? जहाँ कहीं भी सनातन काल का प्रभाव है, वहीं- वहीं जन्म, रोग, बुढ़ापा तथा मृत्यु इन कष्टों की शृंखला का अस्तित्व है और ये सारे अपराजेय हैं।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥