श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
पितृभ्रातृसुहृत्पुत्रा हतास्ते विगतं वयम् ।
आत्मा च जरया ग्रस्त: परगेहमुपाससे ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
पितृ—पिता; भ्रातृ—भाई; सुहृत्—शुभचिन्तक; पुत्रा:—पुत्र; हता:—सारे के सारे मृत; ते—आपके; विगतम्—नि:शेष; वयम्—आयु; आत्मा—शरीर; च—भी; जरया—वृद्धावस्था से; ग्रस्त:—अभिभूत, परास्त; पर-गेहम्—दूसरे के घर; उपाससे—जमे रहते हो ।.
 
अनुवाद
 
 आपके पिता, भाई, शुभचिन्तक तथा पुत्र सभी मर चुके हैं और दूर चले गये हैं। आपने स्वयं भी अपने जीवन का अधिकांश समय व्यतीत कर लिया है, अब आपके शरीर को बुढ़ापे ने आ दबोचा है और आप पराए घर में पड़े हुए हैं।
 
तात्पर्य
 राजा धृतराष्ट्र को क्रूर काल द्वारा वशीभूत उनकी गम्भीर दशा का स्मरण कराया जा रहा है। उन्हें अपने विगत अनुभव के कारण उन्हें अधिक बुद्धिमान हो जाना चाहिए था कि उनके जीवन में क्या घटित होने जा रहा है। उनके पिता, विचित्रवीर्य, काफी पहले मर चुके थे, जब वे तथा उनके छोटे भाई सभी छोटे-छोटे बालक थे। यह तो भीष्मदेव की देखरेख तथा सह्रदयता का परिणाम था कि वे सभी अच्छी तरह पल सके। फिर उनके भाई पाण्डु भी चल बसे। तत्पश्चात्, उनके एक सौ पुत्र तथा सारे पौत्र, अपने अन्य समस्त हितैषि समेत, यथा भीष्मदेव, द्रोणाचार्य, कर्ण तथा अन्य बहुत से राजाओं तथा मित्र सभी, कुरुक्षेत्र के युद्ध में काम आ चुके थे। इस प्रकार उनके सारे जन तथा उनका सारा धन नष्ट हो चुका था और अब वे अपने भतीजे की कृपा पर जीवित थे, जिसे उन्होंने सभी प्रकार की मुसीबतों में डाला था। इन सारी विफलताओं के बावजूद, वे सोच रहे थे कि वे अपना जीवन दीर्घ काल तक ऐसे ही चलाते रहेंगे। धृतराष्ट्र को विदुर यह बता देना चाहते थे कि हर एक को अपने कर्म तथा भगवत्कृपा द्वारा अपनी रक्षा करनी होती है। मनुष्य को श्रद्धापूर्वक अपना कर्म करना चाहिए, फल तो परमेश्वर पर आश्रित है। जो व्यक्ति परमेश्वर द्वारा रक्षित नहीं है, उसकी रक्षा न कोई मित्र, न सन्तानें, न पिता, न भाई, न राज्य या अन्य कोई कर सकता है। अतएव मनुष्य को भगवान् के संरक्षण की खोज करनी चाहिए, क्योंकि यह मनुष्य जीवन इसी खोज के लिए मिला है। उन्हें उनकी गम्भीर स्थिति की जानकारी निम्नलिखित शब्दों द्वारा और भी अधिक दी गई।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥