श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
पतिं प्रयान्तं सुबलस्य पुत्री
पतिव्रता चानुजगाम साध्वी ।
हिमालयं न्यस्तदण्डप्रहर्षं
मनस्विनामिव सत्सम्प्रहार: ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
पतिम्—अपने पति को; प्रयान्तम्—घर त्यागते समय; सुबलस्य—राजा सुबल की; पुत्री—योग्य पुत्री; पति-व्रता—अपने पति को समर्पित; च—भी; अनुजगाम—पीछे-पीछे गई; साध्वी—सती; हिमालयम्—हिमालय पर्वत की ओर; न्यस्त-दण्ड— संन्यास आश्रम के दण्ड को स्वीकार करनेवाला; प्रहर्षम्—हर्ष का विषय; मनस्विनाम्—महान् योद्धाओं का; इव—सदृश; सत्—वैध; सम्प्रहार:—अच्छी पिटाई ।.
 
अनुवाद
 
 कन्दहार (गान्धार) के राजा सुबल की पुत्री, परम साध्वी गान्धारी ने जब यह देखा कि उसके पति हिमालय पर्वत की ओर जा रहे हैं, जो कि संन्यासियों को वैसा ही आनन्द देता है जैसा कि युद्ध के मैदान में योद्धा को शत्रुओं के प्रहार से प्राप्त होता है, तो वह भी अपने पति के पीछे-पीछे चल पड़ीं।
 
तात्पर्य
 सुबल की पुत्री तथा राजा धृतराष्ट्र की पत्नी, सौबलिनी अर्थात् गान्धारी, अत्यन्त पति परायणा आदर्श पत्नी थीं। वैदिक सभ्यता में साध्वी तथा पतिव्रता स्त्रियाँ होती थीं, जिनमें से गान्धारी का भी वर्णन इतिहास में पाया जाता है। लक्ष्मीजी सीता देवी एक महान् राजा की पुत्री होते हुए भी अपने पति भगवान् रामचन्द्र के पीछे-पीछे जंगल गईं। इसी प्रकार सामान्य स्त्री की तरह, गान्धारी अपने घर या मायके में रह सकती थीं, किन्तु साध्वी तथा भद्र महिला की भाँति, बिना कुछ विचार किये उन्होंने अपने पति का अनुसरण किया। विदुर ने धृतराष्ट्र को वानप्रस्थ आश्रम के उपदेश दिये थे और गान्धारी अपने पति के साथ-साथ रहीं। किन्तु उन्होंने यह नहीं कहा कि तुम मेरे साथ चलो, क्योंकि उस समय वे उसी तरह दृढ़-संकल्प थे, जिस प्रकार एक महान् योद्धा युद्धभूमि में सभी प्रकार के खतरों को झेलता है। वे तथाकथित पत्नी या सम्बन्धियों के प्रति अब तनिक भी आकृष्ट न थे, उन्होंने अकेले ही जाने का निश्चय किया था, किन्तु साध्वी नारी के रूप में गांधारी ने अन्तिम क्षण तक अपने पति का अनुसरण करने का निश्चय किया। महाराज धृतराष्ट्र ने वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार कर लिया। इस अवस्था में स्त्री को स्वेच्छा से सेविका-रूप में साथ रहने की अनुमति है, लेकिन संन्यास आश्रम में कोई भी पत्नी अपने पूर्व पति के साथ नहीं रह सकती। नागरिकता की दृष्टि से, संन्यासी मृत मनुष्य समझा जाता है, अतएव उसकी स्त्री अपने पूर्व पति से किसी प्रकार का सम्बन्ध न रखने के कारण विधवा हो जाती है। महाराज धृतराष्ट्र ने अपनी श्रद्धालु पत्नी को मना नहीं किया और वह स्वेच्छा से अपने पति का अनुसरण करती रही।

संन्यासी लोग संन्यास आश्रम के प्रतीक-स्वरूप दण्ड धारण करते हैं। संन्यासी दो प्रकार के होते हैं। जो श्रीपाद शंकराचार्य के मायावादी दर्शन का अनुसरण करते हैं, वे केवल एक दण्ड स्वीकार करते हैं (एक-दण्डी ), किन्तु जो वैष्णव दर्शन का पालन करते हैं, वे तीन संयुक्त दण्ड धारण करते हैं (त्रि-दण्डी )। मायावादी संन्यासी एक-दण्डी स्वामी होते हैं जबकि वैष्णव संन्यासी त्रिदण्डी स्वामी, या और स्पष्टता से कहा जाए तो त्रि-दण्डी गोस्वामी कहलाते हैं, जिससे मायावादी चिन्तकों से अन्तर किया जा सके। एक-दण्डी स्वामी अधिकांशतया हिमालय के प्रेमी होते हैं, लेकिन वैष्णव संन्यासी वृन्दावन तथा पुरी के लिये इच्छुक रहते हैं। वैष्णव संन्यासी नरोत्तम होते हैं जबकि मायावादी संन्यासी धीर होते हैं। महाराज धृतराष्ट्र को धीरों का अनुगमन करने की सलाह दी गई थी, क्योंकि उस अवस्था में उनके लिये नरोत्तम बन पाना कठिन था।

 
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