श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
सञ्जय उवाच
नाहं वेद व्यवसितं पित्रोर्व: कुलनन्दन ।
गान्धार्या वा महाबाहो मुषितोऽस्मि महात्मभि: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
सञ्जय: उवाच—संजय ने कहा; न—नहीं; अहम्—मैं; वेद—जानता हूँ; व्यवसितम्—संकल्प; पित्रो:—चाचाओं का; व:— आपके; कुल-नन्दन—हे कुरुवंश की सन्तान; गान्धार्या:—गान्धारी का; वा—अथवा; महा-बाहो—हे महान् राजा; मुषित:— धोखा दिया गया, ठगा गया; अस्मि—हूँ; महा-आत्मभि:—उन महात्माओं द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 संजय ने कहा : हे कुरुवंशी, मुझे आपके दोनों ताउओं तथा गान्धारी के संकल्प का कुछ भी पता नहीं है। हे राजन्, उन महात्माओं द्वारा मैं तो ठगा गया।
 
तात्पर्य
 यह जानकर आश्चर्य होगा कि महात्मा अन्यों को धोखा देते (ठगते) हैं, किन्तु यह तथ्य है कि महात्मा महत् कार्य के लिए अन्यों को ठगते हैं। कहा जाता है कि भगवान् कृष्ण ने युधिष्ठिर को सलाह दी थी कि वे द्रोणाचार्य के समक्ष असत्य बोलें और यह भी एक महान् उद्देश्य के लिए था। चूँकि भगवान् इसे चाहते थे, अत: यह महान् उद्देश्य था। जो प्रामाणिक भक्त है, उसके समक्ष एकमात्र कसौटी है भगवान् की प्रसन्नता और उसके जीवन की चरम सिद्धि यह है कि अपने धर्म द्वारा भगवान् को प्रसन्न किया जाय। यह गीता तथा भागवत का निर्णय है।* गांधारी समेत धृतराष्ट्र तथा विदुर ने, संजय से अपना संकल्प प्रकट नहीं किया, यद्यपि वह निजी सहायक के रूप में धृतराष्ट्र के साथ निरन्तर रहता था। संजय ने यह कभी नहीं सोचा था कि धृतराष्ट्र उससे पूछे बिना कोई काम करेंगे। किन्तु धृतराष्ट्र का घर से निकल जाना इतना गोपनीय था कि संजय को भी इसका पता नहीं चल पाया। सनातन गोस्वामी ने भी बन्दी-गृह के पहरेदार को धोखा दिया, तभी वे श्री चैतन्य महाप्रभु से मिल पाये थे। इसी प्रकार रघुनाथ दास गोस्वामी ने भी अपने पुरोहित को धोखा देकर भगवान् को प्रसन्न करने के लिए घर छोड़ा था। भगवान् को प्रसन्न करने के लिए जो कुछ भी किया जाय वह उत्तम है, क्योंकि यह परम सत्य से सम्बन्धित रहता है। हमने भी अपने परिवार वालों को धोखा दिया था और श्रीमद्भागवत की सेवा में लगने के लिए घर छोड़ा था। एक महान् कार्य के लिए इस तरह धोखा देना आवश्यक था और ऐसे दिव्य षड्यंत्र में किसी भी पक्ष को कोई क्षति नहीं होती।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥