श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक
तस्माज्जह्यङ्ग वैक्लव्यमज्ञानकृतमात्मन: ।
कथं त्वनाथा: कृपणा वर्तेरंस्ते च मां विना ॥ ४५ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मात्—अतएव; जहि—छोड़ दो; अङ्ग—हे राजा; वैक्लव्यम्—मानसिक विकलता; अज्ञान—अज्ञान; कृतम्—के कारण; आत्मन:—अपना; कथम्—कैसे; तु—लेकिन; अनाथा:—असहाय; कृपणा:—निरीह प्राणी; वर्तेरन्—जीवित रहने में समर्थ; ते—वे; च—भी; माम्—मेरे; विना—रहित ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव तुम आत्मा को न जानने के कारण उत्पन्न अपनी चिन्ता छोड़ दो। अब आप यह सोच रहे है कि वे असहाय जीव तुम्हारे बिना किस तरह रहेंगे।
 
तात्पर्य
 जब हम अपने सगे-सम्बन्धियों को असहाय तथा अपने ऊपर आश्रित सोचते हैं, तो यह अज्ञान के कारण होता है। परमेश्वर के आदेश से प्रत्येक जीव को इस संसार में उसकी अर्जित स्थिति के अनुसार सुरक्षा प्रदान की गई है। भगवान् भूत-भृत् कहलाते हैं, अर्थात् वे जो सभी जीवों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। मनुष्य को केवल अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अतिरिक्त अन्य कोई किसी को भी सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता। अगले श्लोक में इसकी स्पष्ट व्याख्या की गई है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥