श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
तदिदं भगवान् राजन्नेक आत्मात्मनां स्वद‍ृक् ।
अन्तरोऽनन्तरो भाति पश्य तं माययोरुधा ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—अत:; इदम्—यह अभिव्यक्ति; भगवान्—भगवान्; राजन्—हे राजन्; एक:—एक अद्वितीय; आत्मा—परमात्मा; आत्मनाम्—अपनी शक्तियों से; स्व-दृक्—गुणों में अपने ही जैसा; अन्तर:—बाहर; अनन्तर:—भीतर तथा अपने द्वारा; भाति—प्रकट करता है; पश्य—देखो; तम्—उन्हें ही; मायया—विभिन्न शक्तियों के प्राकट्य से; उरुधा—अनेक प्रतीत होता है ।.
 
अनुवाद
 
 अतएव हे राजन्, तुम्हें एकमात्र परमेश्वर को देखना चाहिए, जो अद्वितीय हैं और जो विभिन्न शक्तियों से साक्षात् प्रकट होते हैं और भीतर तथा बाहर दोनों में हैं।
 
तात्पर्य
 पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अद्वितीय हैं, किन्तु वे अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा स्वयं प्रकट होते हैं, क्योंकि वे स्वभाव से आनन्दमय हैं। सारे जीव भी उनकी तटस्था शक्ति के प्राकट्य हैं, जो गुणों में भगवान् के समान हैं और भगवान् की बहिरंगा तथा अंतरंगा शक्तियों के भीतर तथा बाहर, दोनों ही जगह असंख्य जीव हैं। चूँकि आध्यात्मिक जगत भगवान् की अन्तरंगा शक्ति की अभिव्यक्ति हैं, अतएव जो जीव उस अन्तरंगा शक्ति के भीतर हैं, वे बहिरंगा शक्ति से दूषित हुए बिना, गुण में भगवान् समान ही हैं। जीव भगवान् से गुणों में एक होकर भी, भौतिक जगत के कल्मष के कारण विकृत रूप में दिखता है। अतएव उसे भौतिक जगत में तथाकथित सुख तथा दुख का अनुभव होता है। ऐसे अनुभव क्षणिक होते हैं और उनसे आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे क्षणिक सुख तथा दुख की अनुभूति अपने भगवान् के समान गुण की विस्मृति के कारण होती है। किन्तु भगवान् से भीतर तथा बाहर एक नियमित धारा प्रवाहित होती रहती है, जिससे जीव अपनी पतित अवस्था को सुधार सकता है। भीतर से, वे अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में इच्छा करनेवाले जीवों को सुधारते हैं और बाहर से, वे गुरु तथा शास्त्रों के रूप में अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सुधारते रहते हैं। मनुष्य को भगवान् की ओर ही दृष्टि लगानी चाहिए। उसे तथाकथित सुख तथा दुख प्रकट होने पर विचलित नहीं होना चाहिए, अपितु पतितात्माओं का सुधार करने के भगवान् के बाह्यकार्यों में उनकी सहायता करनी चाहिए। उन्हीं के आदेश से ही मनुष्य को आध्यात्मिक गुरु बनकर उनको सहयोग देना चाहिए। किसी को अपने निजी लाभ के लिए, आजीविका कमाने के लिए अथवा धन्धे के साधन के लिए गुरु नहीं बनना चाहिए। ऐसे प्रामाणिक गुरु जो भगवान् को सहयोग देने के लिए भगवान् की ओर दृष्टि लगाते हैं, वे गुणात्मक रूप से भगवान् से एक होते हैं और भुलक्कड़ जीव केवल विकृत प्रतिबिम्ब मात्र होते हैं। अतएव युधिष्ठिर महाराज को नारद उपदेश देते हैं कि वे तथाकथित सुख तथा दुख के मामलों से तनिक भी विचलित न हों, अपितु भगवान् के उस ध्येय को पूरा करने के लिए भगवान् की ओर देखें, जिसके लिए भगवान् अवतरित हुए हैं। यही उनका मूल कर्तव्य है।
 
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