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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.13.5 
प्रत्युज्जग्मु: प्रहर्षेण प्राणं तन्व इवागतम् ।
अभिसङ्गम्य विधिवत् परिष्वङ्गाभिवादनै: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रति—की ओर; उज्जग्मु:—गया; प्रहर्षेण—अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; प्राणम्—जीवन, प्राण; तन्व:—शरीर का; इव—सदृश; आगतम्—वापस आया; अभिसङ्गम्य—निकट जाकर; विधि-वत्—अच्छी तरह से; परिष्वङ्ग—आलिंगन; अभिवादनै:— अभिवादन (प्रणाम) द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 वे सब परम प्रसन्नतापूर्वक उनके निकट गये, मानो उनके शरीरों में फिर से प्राण का संचार हुआ हो। उन्होंने एक दूसरे को प्रणाम किया और गले मिलते हुए एक दूसरे का स्वागत किया।
 
तात्पर्य
 चेतना के अभाव में शरीर के अंग निष्क्रिय रहते हैं, लेकिन जब चेतना वापस आती है, तो अंग तथा इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं और जीव हर्षित हो उठता है। कौरव-परिवार के लिए विदुर इतने प्रिय थे कि राजमहल में उनकी अनुपस्थिति की तुलना निष्क्रियता से की गई थी। सभी लोग उनके तीव्र वियोग का अनुभव कर रहे थे। अतएव राजमहल में उनका वापस आना सभी के लिए आनन्ददायक था।
 
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>  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥