श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक
निष्पादितं देवकृत्यमवशेषं प्रतीक्षते ।
तावद् यूयमवेक्षध्वं भवेद् यावदिहेश्वर: ॥ ५० ॥
 
शब्दार्थ
निष्पादितम्—सम्पन्न; देव-कृत्यम्—देवताओं की ओर से जो कुछ होना था; अवशेषम्—शेष; प्रतीक्षते—प्रतीक्षित होकर; तावत्—उस समय तक; यूयम्—आप सारे पाण्डव; अवेक्षध्वम्—देखो तथा प्रतीक्षा करो; भवेत्—हो; यावत्—जब तक; इह—इस संसार में; ईश्वर:—परमेश्वर ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने देवताओं की सहायता करने का अपना कर्तव्य पहले ही पूरा कर दिया है और जो शेष है, उसके लिए वे प्रतीक्षारत हैं। आप सभी पाण्डव तब तक प्रतीक्षा कर सकते हो, जब तक भगवान् इस धरा पर उपस्थित हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् अपने धाम (कृष्णलोक) से, जो आध्यात्मिक आकाश का सर्वोच्च लोक है, इस भौतिक विश्व के देव-शासकों की सहायता करने के लिए तब-तब अवतरित होते हैं, जब-जब वे उन असुरों द्वारा अत्यधिक सताये जाते हैं, जो न केवल भगवान् से अपितु उनके भक्तों से भी द्वेष रखते हैं। जैसाकि ऊपर कहा जा चुका है, बद्धजीव अपनी ही रुचि से भौतिक जगत के साधनों पर प्रभुत्व जताने की अपनी प्रबल इच्छा द्वारा प्रेरित होकर भौतिक संसर्ग में आते हैं और वे सभी वस्तुओं के नकली स्वामी बन बैठते हैं। प्रत्येक व्यक्ति नकली ईश्वर बनना चाहता है; ऐसे नकली ईश्वरों में प्रबल होड़ लगी रहती है और ऐसे प्रतियोगी सामान्यतया असुर कहलाते हैं। जब संसार में असुरों की संख्या बढ़ जाती है, तब यह जगत भगवद्भक्तों के लिए नरक बन जाता है। असुरों की वृद्धि के कारण जनता, जो स्वाभाविक रूप से भगवान् की भक्ति को समर्पित होती है और उच्चलोक के देवताओं समेत भगवान् के शुद्ध भक्त उद्धार के लिए भगवान् से प्रार्थना करते हैं, और तब भगवान् या तो स्वयं अपने धाम से नीचे आते हैं या अपने भक्तों में से किसी को मानव या पशु-समाज की गिरी दशा सुधारने के लिए नियुक्त करते हैं। ऐसी अशान्ति केवल मानव समाज में ही नहीं, अपितु पशुओं, पक्षियों या उच्च लोकों के देवताओं सहित अन्य जीवों के बीच भी मचती रहती है। भगवान् श्रीकृष्ण तब कंस, जरासंध तथा शिशुपाल जैसे असुरों का वध करने के लिए स्वयं अवतरित हुए। महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल में लगभग इन सारे असुरों का वध भगवान् ने किया। अब वे अपने ही वंश, यदुवंश के विनाश की प्रतीक्षा में थे, जो इस संसार में उनकी अपनी इच्छा से ही प्रकट हुआ था। वे अपने स्वयं के नित्य धाम जाने के पूर्व इस वंश को समेट लेना चाहते थे। नारद ने, विदुर की तरह, यदुवंश के आसन्न विनाश की बात प्रकट नहीं होने दी, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उन्होंने राजा तथा उनके भाइयों से संकेत कर दिया कि वे इस घटना के घटने तथा भगवान् के प्रयाण करने तक प्रतीक्षा करें।
 
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