श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक
स्‍नात्वानुसवनं तस्मिन्हुत्वा चाग्नीन्यथाविधि ।
अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्ते विगतैषण: ॥ ५३ ॥
 
शब्दार्थ
स्नात्वा—स्नान करके; अनुसवनम्—नियमित रूप से तीन बार (प्रात:, दोपहर तथा संध्या समय); तस्मिन्—सप्तधा गंगा में; हुत्वा—अग्निहोत्र यज्ञ करके; च—भी; अग्नीन्—अग्नि में; यथा-विधि—शास्त्र के नियमों के अनुसार; अप्-भक्ष:—केवल जल पीकर उपवास करके; उपशान्त—पूर्ण रूप से संयमित; आत्मा—स्थूल इन्द्रियों तथा सूक्ष्म मन; स:—धृतराष्ट्र; आस्ते— स्थित होंगे; विगत—रहित; एषण:—पारिवारिक कुशलता-सम्बन्धी विचार ।.
 
अनुवाद
 
 इस समय सप्तस्रोत के तट पर धृतराष्ट्र नित्य तीन बार प्रात:, दोपहर तथा संध्या समय, स्नान करके, अग्निहोत्र यज्ञ सम्पन्न करके तथा केवल जल पीकर अष्टांग योग का अभ्यास करने में लगे हैं। इससे मनुष्य को मन तथा इन्द्रियों पर संयम रखने में सहायता मिलती है और वह पारिवारिक स्नेह-सम्बन्धी विचारों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।
 
तात्पर्य
 योग-पद्धति इन्द्रियों तथा मन को वश में करने तथा उन्हें पदार्थ से आत्मा की ओर मोडऩे की यांत्रिक विधि है। इसकी प्रारम्भिक विधियाँ हैं—आसन, ध्यान, आध्यात्मिक विचार, प्राणायाम, समाधि तथा परम पुरुष परमात्मा की ओर उन्मुख होना। इस तरह की यांत्रिक विधि से आध्यात्मिक पद तक ऊपर उठने के लिए कुछ विधान नियत किए गए हैं—दिन में तीन बार स्नान करना, जहाँ तक सम्भव हो उपवास करना, आसन मारकर मन को आध्यात्मिक विषयों में एकाग्र करना तथा इस प्रकार धीरे-धीरे विषय अर्थात् भौतिक ध्येय से मुक्त होना। भौतिक जगत का अर्थ है भौतिक विषय में लिप्त होना, जो भ्रम मात्र है। घर, देश, परिवार, समाज, सन्तान, सम्पत्ति तथा व्यापार—ये आत्मा के कतिपय आवरण हैं। योग-पद्धति इन मोहमय विचारों से मुक्त होने और क्रमश: परम पुरुष परमात्मा की ओर मुडऩे में सहायक होती है। भौतिक संगति तथा शिक्षा द्वारा हम व्यर्थ की वस्तुओं में केन्द्रित होना सीखते हैं, लेकिन योग ऐसी विधि है, जिससे हम इन्हें पूरी तरह से भूल जाते हैं। आधुनिक तथाकथित योगी तथा योग-पद्धतियाँ कुछ जादू जैसे करतब दिखाती हैं और अज्ञानी लोग ऐसी झूठी बातों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, अथवा वे स्थूल शरीर के रोगों को अच्छा करने के लिए, इसे एक सस्ती विधि के रूप में मानते हैं। लेकिन वास्तव में, योग-पद्धति वह विधि है, जिससे हमने जीवन-सघर्ष के दौरान जो कुछ सीखा है, उसे हम भुला सकें। धृतराष्ट्र आजीवन अपने पुत्रों के लिए पाण्डवों की सम्पत्ति छीनकर उनका जीवन-स्तर ऊँचा करके पारिवारिक मामलों को सुधारने में व्यस्त रहे। नितान्त भौतिकतावादी एवं आध्यात्मिक शक्ति के ज्ञान से रहित व्यक्ति के लिए यही सामान्य व्यापार हैं। वह यह नहीं देख पाता कि ये किस तरह उसे स्वर्ग से नरक में घसीट कर ले जा सकते हैं। किन्तु अपने छोटे भाई विदुर के अनुग्रह से, धृतराष्ट्र को ज्ञान हुआ और वे अपने निपट मोहयुक्त व्यापारों को देख पाये और ऐसे ज्ञान के कारण ही वे आत्मानुभूति के लिए अपना घर छोड़ सके। श्री नारददेव ऐसे स्थान पर, जो स्वर्गिक गंगा के प्रवाह से पवित्र था, उनकी आध्यात्मिक प्रगति की भविष्यवाणी कर रहे थे। बिना भोजन किये केवल जल पीकर रहना भी उपवास करना माना जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान-प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है। मूर्ख व्यक्ति विधि-विधानों का पालन किये बिना सस्ता योगी बनना चाहता है। सर्वप्रथम जिस व्यक्ति की अपनी जीभ पर लगाम नहीं है, वह कभी योगी नहीं बन सकता। योगी तथा भोगी दो विरोधी शब्द हैं। भोगी अर्थात् जो खाता-पीता, मौज करता है, वह योगी नहीं बन सकता, क्योंकि योगी को मनमाना खाने तथा पीने की छूट कभी भी नहीं है। हमें इस बात पर ध्यान देने से लाभ होगा कि धृतराष्ट्र ने केवल जल पीकर तथा एकान्त में बैठकर भगवान् हरि के विचारों में तन्मय होकर कैसे अपना योग प्रारम्भ किया था।
 
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