श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 56
 
 
श्लोक
ध्वस्तमायागुणोदर्को निरुद्धकरणाशय: ।
निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाचल: ।
तस्यान्तरायो मैवाभू: सन्न्यस्ताखिलकर्मण: ॥ ५६ ॥
 
शब्दार्थ
ध्वस्त—विनष्ट होकर; माया-गुण—भौतिक प्रकृति के गुण; उदर्क:—परवर्ती प्रभाव; निरुद्ध—रुक कर; करण-आशय:— इन्द्रियाँ तथा मन; निवर्तित—रुका हुआ; अखिल—समस्त; आहार:—इन्द्रियों का भोजन; आस्ते—आसीन है; स्थाणु:— अचऱ; इव—सदृश; अचल:—स्थिर; तस्य—उसके; अन्तराय:—विघ्न, बाधाएँ; मा एव—कभी इस तरह; अभू:—हो; सन्न्यस्त—विरक्त; अखिल—सभी तरह के; कर्मण:—भौतिक कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 उन्हें इन्द्रियों के सारे कार्य बाहर से भी रोक देने होंगे और भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित होनेवाली इन्द्रियों की अन्त:क्रियाओं के प्रति भी अभेद्य रहना होगा। इन सारे भौतिक कार्यों का परित्याग करने पर वे अचल हो जायेंगे और मार्ग के सारे अवरोधों को पार कर जायेंगे।
 
तात्पर्य
 धृतराष्ट्र ने योग-विधि के द्वारा सब प्रकार की भौतिक प्रतिक्रिया का निषेध करने का स्तर प्राप्त कर लिया था। प्रकृति के भौतिक गुणों के प्रभाव का शिकार बना जीव पदार्थ को भोगने की दुर्दम्य इच्छा के वश हो जाता है, किन्तु योग-विधि से मनुष्य ऐसे मिथ्या भोग से बच सकता है। प्रत्येक इन्द्रिय सदा अपने भोजन की तलाश में रहती है और इस तरह बद्धजीव पर चारों ओर से हमला होता है और उसे किसी भी कार्य में स्थिर होने का अवसर नहीं मिल पाता। नारद ने महाराज युधिष्ठिर को सलाह दी कि वे अपने ताऊ को घर वापस लाने का प्रयास करके उन्हें विचलित न करें। वे अब किसी भी भौतिक वस्तु के आकर्षण से परे थे। भौतिक
प्रकृति के गुणों की कार्य करने की विभिन्न विधियाँ हैं, किन्तु प्रकृति के भौतिक गुणों के भी ऊपर आध्यात्मिक गुण हैं, जो परमपूर्ण हैं। निर्गुण का अर्थ है, प्रतिक्रिया-विहीन। आध्यात्मिक गुण तथा इसका प्रभाव समान हैं, अतएव आध्यात्मिक गुण को निर्गुण कहकर उसे भौतिक गुण से भिन्न दिखाया जाता है। प्रकृति के भौतिक गुणों से पूर्णत: अवरुद्ध होने पर, मनुष्य आध्यात्मिक मंडल में प्रवेश करता है और आध्यात्मिक गुणों से प्रेरित कर्म भक्ति कहलाता है। अतएव भक्ति परम पूर्ण के सीधे सम्पर्क द्वारा प्राप्त किया गया निर्गुण है, जिसे परम-पूर्ण सम्पर्क द्वारा प्राप्त किया जाता है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥