श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक
दह्यमानेऽग्निभिर्देहे पत्यु: पत्नी सहोटजे ।
बहि: स्थिता पतिं साध्वी तमग्निमनु वेक्ष्यति ॥ ५८ ॥
 
शब्दार्थ
दह्यमाने—जलते हुए; अग्निभि:—अग्नि द्वारा; देहे—शरीर में; पत्यु:—पति के; पत्नी—पत्नी; सह-उटजे—कुटिया समेत; बहि:—बाहर; स्थिता—स्थित; पतिम्—पति को; साध्वी—सती नारी; तम्—उस; अग्निम्—अग्नि को; अनु वेक्ष्यति— ध्यानपूर्वक देखते हुए अग्नि में प्रवेश करेगी ।.
 
अनुवाद
 
 बाहर से अपने पति को अपनी योग शक्ति की अग्रि में अपनी कुटिया समेत जलता हुआ देखकर उसकी साध्वी पत्नी एकाग्रता पूर्वक ध्यानमग्न होकर अग्नि में प्रवेश करेगी।
 
तात्पर्य
 गान्धारी एक आदर्श सती नारी थीं। वे अपने पति की जीवन-संगिनी थीं, अतएव जब उन्होंने देखा कि उनके पति योग की अग्नि में पर्णकुटी समेत जल रहे हैं, तो वे निराश हो गईं। उन्होंने अपने सौ पुत्र खोने के बाद घर छोड़ दिया था और अब जंगल में अपने अत्यन्त प्रिय पति को भी जलते हुए देख रही थीं। अब वे वास्तव में अकेली अनुभव कर रहीं थीं, अतएव वे भी अपने पति की अग्नि में प्रवेश कर, पति का अनुगमन करते हुए मर गईं। सती स्त्री का अपने पति की अग्नि में प्रवेश करना सती-संस्कार कहलाता है और यह कर्म स्त्री के लिए अत्युत्तम माना जाता है। बाद के युग में, यह सती-प्रथा अत्यन्त घृणित अपराधी कृत्य बन गयी, क्योंकि यह प्रथा अनिच्छित स्त्री पर भी थोपी जाने लगी। इस पतित युग में किसी भी स्त्री के लिए गान्धारी तथा अन्यों के समान सती-संस्कार का शुद्ध विधि से पालन करना सम्भव नहीं है। गान्धारी-जैसी सती नारी को पति का वियोग वास्तविक अग्नि से अधिक दाहक प्रतीत होता था। ऐसी नारी स्वेच्छा से सती-धर्म का पालन कर सकती है, किन्तु किसी के द्वारा बल प्रयोग नहीं किया जाता है। जब यह प्रथा औपचारिकता बन गयी, तो इस नियम के पालन कराने के लिए नारी पर बलप्रयोग किया जाने लगा, तब यह सचमुच अपराध-पूर्ण बन गयी, अतएव राज-नियम द्वारा इसे बन्द कराना पड़ा। नारदमुनि की इस भविष्यवाणी ने, महाराज युधिष्ठिर को अपनी विधवा ताई के पास जाते रोक दिया।
 
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