श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 60

 
श्लोक
इत्युक्त्वाथारुहत् स्वर्गं नारद: सहतुम्बुरु: ।
युधिष्ठिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुच: ॥ ६० ॥
 
शब्दार्थ
इति—इस प्रकार; उक्त्वा—सम्बोधित करके; अथ—तत्पश्चात्; आरुहत्—चढ़ गये; स्वर्गम्—बाह्य आकाश में; नारद:—महर्षि नारद; सह—के साथ; तुम्बुरु:—तम्बूरा; युधिष्ठिर:—महाराज युधिष्ठिर ने; वच:—उपदेश; तस्य—उनका; हृदि कृत्वा—हृदय में रखकर; अजहात्—त्याग दिया; शुच:—सारा शोक ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसा कहकर महर्षि नारद, अपनी वीणा-समेत बाह्य आकाश में चले गये। युधिष्ठिर ने उनके उपदेश को अपने हृदय में धारण किया, जिससे वे सारे शोकों से मुक्त हो गये।
 
तात्पर्य
 श्री नारदजी शाश्वत अन्तरिक्ष पुरुष हैं, जिन्हें भगवत्कृपा से आध्यात्मिक शरीर प्राप्त हुआ है। वे बिना किसी प्रतिरोध के, भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगतों के बाह्य आकाश में विचरण कर सकते हैं और देखते ही देखते, दूर-सूदूर के किसी भी ग्रह में तत्क्षण पहुँच सकते हैं। दासी-पुत्र के रूप में हम उनके विगत जीवन का वर्णन पहले ही कर चुके हैं। शुद्ध भक्तों की संगति करने से ही, उन्हें शाश्वत अन्तरिक्ष-पुरुष का पद प्राप्त
हुआ था, अतएव उन्हें विचरण करने की स्वतंत्रता थी। हमें नारदमुनि के चरण-चिह्नों पर चलने का प्रयास करना चाहिए और यांत्रिक साधनों से अन्य लोकों तक पहुँचने का व्यर्थ प्रयास नहीं करना चाहिए। महाराज युधिष्ठिर धर्मात्मा राजा थे, अतएव समय-समय पर उन्हें नारदमुनि के दर्शन होते रहते थे; अतएव जो नारदमुनि का दर्शन करने के इच्छुक हों, उन्हें सर्वप्रथम पवित्र बनना होगा और नारदमुनि के चरण-चिह्नों पर चलना होगा।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कन्ध के अन्तर्गत “धृतराष्ट्र द्वारा गृहत्याग” नामक तेरहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥