श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 13: धृतराष्ट्र द्वारा गृह-त्याग  »  श्लोक 9

 
श्लोक
कया वृत्त्या वर्तितं वश्चरद्भ‍ि: क्षितिमण्डलम् ।
तीर्थानि क्षेत्रमुख्यानि सेवितानीह भूतले ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
कया—किन; वृत्त्या—साधनों से; वर्तितम्—जीविका चलाते रहे; व:—आप; चरद्भि:—विचरण करते हुए; क्षिति- मण्डलम्—पृथ्वी पर; तीर्थानि—तीर्थ-स्थानों; क्षेत्र-मुख्यानि—प्रमुख पवित्र स्थानों; सेवितानि—आपके द्वारा सेवित; इह—इस संसार में; भूतले—इस ग्रह में ।.
 
अनुवाद
 
 पृथ्वी पर विचरण करते हुए, आपने अपनी जीविका कैसे चलाई? आपने किन-किन पवित्र स्थलों तथा तीर्थस्थानों पर सेवा की?
 
तात्पर्य
 विदुर राजमहल से बाहर इसलिए चले गये थे, क्योंकि वे अपने को घरेलू मामलों से, विशेष रूप से राजनीतिक षड्यंत्रों से विलग करना चाह रहे थे। जैसाकि इसके पूर्व उल्लेख किया जा चुका है, दुर्योधन उन्हें शूद्राणी-पुत्र कहकर उनका एक तरह से अपमान कर चुका था, यद्यपि किसी की पितामही (दादी) के विषय में अनाप-शनाप बातें करना कोई नई बात नहीं है। विदुर की माता शूद्राणी होते हुए भी, दुर्योधन की दादा लगती थी और कभी-कभी दादी तथा नातियों के बीच ऐसा मजाक चलता है। चूँकि यह छींटाकशी एक वास्तविकता थी, अतएव विदुर को बुरी लगनेवाली थी; फलत: इसे प्रत्यक्ष अपमान के रूप में ग्रहण किया
गया। फलस्वरूप, विदुर ने तय किया कि वे अपना पैतृक महल त्याग कर, विरक्त जीवन बिताने की तैयारी करेंगे। यह तैयारी की अवस्था वानप्रस्थ आश्रम कहलाती है, अर्थात् ऐसा विरक्त जीवन जिसमें पृथ्वी भर में विचरण करके तीर्थस्थलों का दर्शन किया जाता है। भारत में वृन्दावन, हरिद्वार, जगन्नाथपुरी तथा प्रयाग जैसे तीर्थस्थलों में अनेक महान् भक्त हैं और जो लोग आध्यात्मिक उन्नति करने के इच्छुक हैं, उनके लिए वे मुफ्त अन्नक्षेत्र (लंगर) चलाये जाते हैं। महाराज युधिष्ठिर यह जानने के लिए उत्सुक थे कि क्या विदुर अपना जीवन-निर्वाह ऐसे अन्नक्षेत्रों (छत्र) से कर रहे थे?
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥