श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
ऊर्वक्षिबाहवो मह्यं स्फुरन्त्यङ्ग पुन: पुन: ।
वेपथुश्चापि हृदये आराद्दास्यन्ति विप्रियम् ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
ऊरु—जाँघें; अक्षि—आँखें; बाहव:—भुजाएँ; मह्यम्—मेरे; स्फुरन्ति—फडक़ते हैं; अङ्ग—शरीर का बाँया भाग; पुन: पुन:— बारम्बार; वेपथु:—धडक़नें; च—भी; अपि—निश्चय ही; हृदये—हृदय में; आरात्—डर के मारे; दास्यन्ति—सूचित कर रहे हैं; विप्रियम्—अशुभ, अनिष्ट ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे शरीर का बाँयाँ भाग, मेरी जाँघें, भुजाएँ तथा आँखें बारम्बार फडक़ रही हैं। भय से मेरा हृदय धडक़ रहा है। ये सब अनिष्ट घटना को सूचित करने वाले हैं।
 
तात्पर्य
 यह भौतिक अस्तित्व अनिष्टों से भरा हुआ है। जिन वस्तुओं को हम नहीं चाहते, वे ही किसी उच्चतर शक्ति द्वारा हम पर लाद दी जाती हैं और हम यह नहीं देख पाते कि ये अनिष्ट प्रकृति के तीनों गुणों के नियंत्रण में हैं। जब किसी मनुष्य की जाँघें, भुजाएँ तथा आँखें लगातार फडक़ें, तो यह समझ लेना चाहिए कि कुछ अनिष्ट होनेवाला है। इन सब अनिष्टों की तुलना दावग्नि से की जाती है। जंगल में कोई आग लगाने नहीं जाता, फिर भी यह आग स्वत: लग जाती है, जिससे जंगल के जीवों को अकल्पनीय विपत्तियाँ सहनी पड़ती हैं। ऐसी आग को किसी भी मानवीय प्रयास से नहीं बुझाया जा सकता। यह अग्नि केवल भगवान् की कृपा से ही बुझ सकती है, जो अग्नि का शमन करने के लिए बादलों को भेजते हैं। इसी प्रकार कितनी भी योजनाएँ क्यों न बनाई जाँय, जीवन की अप्रिय घटनाओं को रोका नहीं जा सकता। ऐसी विपत्तियाँ केवल भगवत्कृपा से ही दूर की जा सकती हैं, जिसके निमित्त भगवान् अपने प्रामाणिक प्रतिनिधि को भेजकर मनुष्य को प्रबुद्ध करते हैं और विपत्तियों से बचाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥