श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
मृत्युदूत: कपोतोऽयमुलूक: कम्पयन् मन: ।
प्रत्युलूकश्च कुह्वानैर्विश्वं वै शून्यमिच्छत: ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
मृत्यु—मृत्यु का; दूत:—दूत; कपोत:—कबूतर; अयम्—यह; उलूक:—उल्लू; कम्पयन्—कँपाती हुई; मन:—मन; प्रत्युलूक:—उल्लुओं के प्रतियोगी, कौवे; च—तथा; कुह्वानै:—चीख; विश्वम्—ब्रह्माण्ड; वै—अथवा; शून्यम्—शून्य; इच्छत:—चाहते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 जरा देखो तो! यह कबूतर मानो मृत्यु का दूत हो। उल्लुओं तथा उनके प्रतिद्वन्द्वी कौवों की चीख मेरे हृदय को दहला रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को शून्य बना देना चाहते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥