श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
धूम्रा दिश: परिधय: कम्पते भू: सहाद्रिभि: ।
निर्घातश्च महांस्तात साकं च स्तनयित्नुभि: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
धूम्रा:—धुँधली; दिश:—सभी दिशाएँ; परिधय:—मंडल; कम्पते—काँपती हुई; भू:—पृथ्वी; सह अद्रिभि:—पर्वतों समेत; निर्घात:—आकाश से वज्रपात; च—भी; महान्—विशाल; तात—हे भीम; साकम्—सहित; च—भी; स्तनयित्नुभि:—बिना बादल के गर्जन ।.
 
अनुवाद
 
 जरा देखो तो, किस तरह धुँआ आकाश को घेरे हुए है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पृथ्वी तथा पर्वत काँप रहे हों। बिना बादलों की यह गर्जन तो जरा सुनो और आकाश से गिरते ब्रजपात को तो देखो!
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥