श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
नद्यो नदाश्च क्षुभिता: सरांसि च मनांसि च ।
न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यति ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
नद्य:—नदियाँ; नदा: च—तथा सहायक नदियाँ; क्षुभिता:—सभी विक्षुब्ध; सरांसि—जलाशय; च—तथा; मनांसि—मन; च—भी; न—नहीं; ज्वलति—जलती है; अग्नि:—अग्नि; आज्येन—घी की सहायता से; काल:—काल, समय; अयम्—यह कितना असामान्य है; किम्—क्या; विधास्यति—होनेवाला है ।.
 
अनुवाद
 
 नदियाँ, नाले, तालाब, जलाशय तथा मन सभी विक्षुब्ध हैं। घी से अग्नि नहीं जल रही हैं, यह कैसा असामान्य समय है? आखिर क्या होने वाला है?
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥