श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
न पिबन्ति स्तनं वत्सा न दुह्यन्ति च मातर: ।
रुदन्त्यश्रुमुखा गावो न हृष्यन्त्यृषभा व्रजे ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; पिबन्ति—पीते हैं; स्तनम्—थन को; वत्सा:—बछड़े; न—नहीं; दुह्यन्ति—दुहने देती हैं; च—भी; मातर:—गाएँ; रुदन्ति—रोती हैं; अश्रु-मुखा:—आँसुओं से युक्त मुँह; गाव:—गाएँ; न—नहीं; हृष्यन्ति—प्रसन्न होते हैं; ऋषभा:—बैल; व्रजे—चरागाह में ।.
 
अनुवाद
 
 बछड़े न तो गौवों के थनों में मुँह लगा रहे हैं, न गौवें दूध देती हैं। वे आँखों में आँसू भरे खड़ी-खड़ी रम्भा रही हैं और बैलों को चरागाहों में कोई प्रसन्नता नहीं हो रही है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥