श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
प्रद्युम्न: सर्ववृष्णीनां सुखमास्ते महारथ: ।
गम्भीररयोऽनिरुद्धो वर्धते भगवानुत ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
प्रद्युम्न:—प्रद्युम्न (भगवान् कृष्ण के पुत्र); सर्व—सभी; वृष्णीनाम्—वृष्णि-परिवार के सदस्यों का; सुखम्—सुख; आस्ते— हैं; महा-रथ:—महान् सेनापति; गम्भीर—गहराई से; रय:—दक्षता; अनिरुद्ध:—अनिरुद्ध (कृष्ण का पौत्र); वर्धते—बढ़ता है; भगवान्—भगवान्; उत—अवश्य चाहिए ।.
 
अनुवाद
 
 वृष्णि-कुल के महान् सेनापति प्रद्युम्न कैसे हैं? वे प्रसन्न तो हैं? और भगवान् के पूर्ण अंश अनिरुद्ध ठीक से तो हैं?
 
तात्पर्य
 प्रद्युम्न और अनिरुद्ध भी भगवान् के अंश हैं और इस तरह वे दोनों भी विष्णु-तत्त्व हैं। द्वारका में भगवान् वासुदेव, अपने पूर्णांशों—संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध—सहित अपनी दिव्य लीलाओं में व्यस्त रहते हैं। अतएव इनमें से प्रत्येक को भगवान् कहा जा सकता है जैसाकि अनिरुद्ध नाम के साथ कहा जा चुका है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥