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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  1.14.31 
सुषेणश्चारुदेष्णश्च साम्बो जाम्बवतीसुत: ।
अन्ये च कार्ष्णिप्रवरा: सपुत्रा ऋषभादय: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
सुषेण:—सुषेण; चारुदेष्ण:—चारुदेष्ण; —तथा; साम्ब:—साम्ब; जाम्बवती-सुत:—जाम्बवती का पुत्र; अन्ये—अन्य; —भी; कार्ष्णि—भगवान् कृष्ण के पुत्र; प्रवरा:—सेना-नायक; स-पुत्रा:—अपने-अपने पुत्रों सहित; ऋषभ—ऋषभ; आदय:—इत्यादि ।.
 
अनुवाद
 
 कृष्ण के सभी सेना-नायक पुत्र यथा सुषेण, चारुदेष्ण, जाम्बवती-पुत्र साम्ब तथा ऋषभ अपने-अपने पुत्रों समेत ठीक से तो रह रहे हैं?
 
तात्पर्य
 जैसाकि पहले कहा चुका है, भगवान् कृष्ण की १६,१०८ पत्नियाँ थीं और हर एक को दस-दस पुत्र थे। अतएव कुल मिलाकर १६,१०८ × १०=१,६१,०८० पुत्र थे। वे सब बड़े हुए तो उनके भी अपने-अपने पिता की तरह दस-दस पुत्र हुए, जिससे भगवान् के परिवार में १६,१०,८०० सदस्य थे। भगवान् असंख्य जीवों के पिता हैं, अतएव उनमें कुछ ही इस पृथ्वी पर भगवान् की द्वारका की दिव्य लीलाओं में उनके संगी रूप में बुलाए गये थे। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि भगवान् के परिवार में इतने सारे लोग थे। अच्छा तो यह होगा कि भगवान् की तुलना अपने साथ करने से बचा जाय और ज्योंही हम भगवान् के दिव्य पद के थोड़े से अंश को ही समझ लेते हैं, त्योंही यह बात एक सच्चाई बन जाती है। राजा युधिष्ठिर ने द्वारका-स्थित भगवान् के पुत्रों तथा पौत्रों का कुशल समाचार पूछते समय उनमें से केवल सेनानायकों के ही नाम लिये हैं, क्योंकि कृष्ण के परिवार भर के सदस्यों के नाम स्मरण रख पाना राजा के लिए सम्भव न था।
 
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