श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 34

 
श्लोक
भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सल: ।
कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्‍वृत: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान् कृष्ण; अपि—भी; गोविन्द:—जो गायों तथा इन्द्रियों को अनुप्राणित करते हैं; ब्रह्मण्य:—भक्तों या ब्राह्मणों को समर्पित; भक्त-वत्सल:—भक्तों के प्रति स्नेहपूर्ण; कच्चित्—क्या; पुरे—द्वारकापुरी में; सुधर्मायाम्—पवित्र सभा में; सुखम्—सुख; आस्ते—भोग करते हैं; सुहृत्-वृत:—मित्रों से घिरे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण, जो गायों, इन्द्रियों तथा ब्राह्मणों को आनन्द प्रदान करने वाले हैं और अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल हैं, अपने मित्रों से घिर कर, द्वारकापुरी में पवित्र सभा का भोग तो कर रहे हैं?
 
तात्पर्य
 इस विशिष्ट श्लोक में भगवान् का वर्णन गोविन्द, ब्रह्मण्य तथा भक्तवत्सल शब्दों से किया गया है। वे भगवान् स्वयं अर्थात् आदि भगवान् हैं और वे समस्त ऐश्वर्य, समस्त शक्ति, समस्त ज्ञान, समस्त सौन्दर्य, समस्त यश तथा समस्त त्याग से परिपूर्ण हैं। कोई न तो उनके तुल्य है, न उनसे बढक़र है। वे गोविन्द हैं, क्योंकि वे गौवों तथा इन्द्रियों के आनन्द हैं। जिन्होंने भगवान् की भक्तिमय सेवा द्वारा अपनी इन्द्रियों को शुद्ध कर लिया है, वे ही उनकी वास्तविक सेवा कर सकते हैं और ऐसी शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा दिव्य आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। केवल अशुद्ध बद्धजीव ही, इन्द्रियों से कोई आनन्द प्राप्त नहीं कर पाते, अपितु इन्द्रियों के मिथ्या आनन्द से मोहग्रस्त हो करके इन्द्रियों के दास बन जाते हैं। अतएव अपने हित के लिए हमें भगवान् के संरक्षण की आवश्यकता है। भगवान् गायों के तथा ब्राह्मण-संस्कृति के रक्षक हैं। जो समाज गो-संरक्षण तथा ब्राह्मण-संस्कृति से विहीन है, वह भगवान् के प्रत्यक्ष संरक्षण में नहीं होता, जिस तरह कि कारागार के बन्दी राजा के संरक्षण में न रहकर, राजा के किसी कठोर प्रतिनिधि के संरक्षण में रहते हैं। गो-संरक्षण तथा मानव समाज में, कम से कम समाज के कुछ सदस्यों में, ब्राह्मण गुणों के अनुशीलन के बिना कोई भी मानव सभ्यता उन्नति नहीं कर सकती। ब्राह्मण संस्कृति से ही ब्राह्मण बना जा सकता है और भगवान् के यथारूप में दर्शन किये जा सकते हैं। ब्राह्मण
संस्कृति सुप्त सत्त्वगुणों का विकास है, जिसमें सत्यनिष्ठा, समता, इन्द्रिय निग्रह, सहिष्णुता, सरलता, सामान्य ज्ञान, दिव्य ज्ञान तथा वैदिक वाङ्मय में अटूट श्रद्धा सम्मिलित हैं। ब्राह्मणत्व की पूर्णता पा लेने के बाद, मनुष्य को भगवद्भक्त बनना होता है, जिससे मालिक, स्वामी, मित्र, पुत्र तथा प्रेमी के रूप में उनके स्नेह को दिव्य रूप से प्राप्त किया जा सके। भक्त की अवस्था, जो भगवान् के दिव्य प्रेम को आकर्षित करती है, उसका तब तक विकास नहीं होता, जब तक मनुष्य उपरोक्त ब्राह्मणत्व के गुणों का विकास नहीं करता। भगवान् ब्राह्मण के गुणों की ओर आकृष्ट होते हैं, उसकी झूठी प्रतिष्ठा की ओर नहीं। जो लोग योग्यता में ब्राह्मण से कम होते हैं, वे भगवान् से किसी प्रकार का सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकते हैं, जैसे कि काष्ठ के बिना कच्ची मिट्टी में आग नहीं जलाई जा सकती, यद्यपि काष्ठ तथा मिट्टी में पारस्परिक सम्बन्ध होता है। चूँकि भगवान् परम पूर्ण हैं, अतएव उनकी कुशलता का प्रश्न ही नहीं उठता। अतएव महाराज युधिष्ठिर ने यह प्रश्न नहीं पूछा। उन्होंने केवल उनके आवास स्थान ‘द्वारकापुरी’ के सम्बन्ध में ही पूछा, जहाँ पुण्यात्मा एकत्र होते हैं। भगवान् वहीं रहते हैं, जहाँ पुण्यात्माएँ एकत्र होती हैं और परम सत्य के गुणगान में आनन्द लेते हैं। महाराज युधिष्ठिर द्वारका के पवित्र व्यक्तियों तथा उनके पुण्य कर्मों के विषय में जानने के लिए उत्सुक थे।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥