श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
यत्पादशुश्रूषणमुख्यकर्मणा
सत्यादयो द्व्यष्टसहस्रयोषित: ।
निर्जित्य सङ्ख्ये त्रिदशांस्तदाशिषो
हरन्ति वज्रायुधवल्लभोचिता: ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसका; पाद—पैर; शुश्रूषण—भोग; मुख्य—सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण; कर्मणा—कर्म के; सत्य-आदय:—सत्यभामा इत्यादि रानियाँ; द्वि-अष्ट—आठ का दो गुना (सोलह); सहस्र—हजार; योषित:—स्त्रियाँ; निर्जित्य—दमन करके; सङ्ख्ये— युद्ध में; त्रि-दशान्—स्वर्ग के निवासियों को; तत्-आशिष:—देवताओं द्वारा भोग्य; हरन्ति—हर लेते हैं; वज्र-आयुध वल्लभा—वज्र के स्वामी की पत्नियाँ; उचिता:—योग्य ।.
 
अनुवाद
 
 समस्त सेवाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण, भगवान् के चरणकमलों की शुश्रूषा करने मात्र से, द्वारका-स्थित सत्यभामा के अधीक्षण में रानियों ने भगवान् को प्रेरित किया कि वे देवताओं को जीत लें। इस प्रकार रानियाँ उन वस्तुओं का भोग कर रही हैं, जो वज्र के नियंत्रक की पत्नियों द्वारा भोग्य हैं।
 
तात्पर्य
 सत्यभामा—द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानियों में से एक। नरकासुर का वध करने के बाद, भगवान् श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ नरकासुर के महल में गये। वे इन्द्रलोक भी सत्यभामा के साथ गये थे, जहाँ सत्यभामा का स्वागत शचीदेवी द्वारा हुआ जिन्होंने देवोंकी माता ‘अदिति’ से उनका परिचय कराया। अदिति सत्यभामा से अत्यन्त प्रसन्न हुईं और उन्होंने वर दिया कि जब तक भगवान् कृष्ण पृथ्वी पर रहें, तब तक वे तरुणी बनी रहें। अदिति ने उन्हें स्वर्गलोक में देवताओं द्वारा भोग्य सारी वस्तुएँ भी दिखलाईं। जब सत्यभामा ने पारिजात पुष्प देखा, तो उन्होंने उसे द्वारका स्थित अपने महल में ले जाने की इच्छा व्यक्त की। तत्पश्चात् वे अपने पति के साथ द्वारका लौट आईं और उनसे इच्छा व्यक्त की कि पारिजात पुष्प को द्वारका में उनके महल में ले आएँ। सत्यभामा का महल बहुमूल्य रत्नों से विशेष रूप से सुसज्जित किया गया था और ग्रीष्मऋतु में भी महल का भीतरी भाग शीतल बना रहता था, मानों वातानुकूलित हो। उन्होंने अपने महल को अनेक पताकाओं से सजा रखा था, जो उनके पति की उपस्थिति की सूचक थीं। एक बार वे अपने पति के साथ जब द्रौपदी से मिलीं, तो वे उत्सुक थीं कि उनसे पति को प्रसन्न करने की कला सीखें। द्रौपदी इस कला में निपुण थीं, क्योंकि उनके पाँच पति थे, जो पाण्डव थे और वे सब उनसे प्रसन्न थे। द्रौपदी से उपदेश लेकर, उन्होंने उनके प्रति शुभकामनाएँ व्यक्त कीं और द्वारका लौट आईं। वे सत्राजित की पुत्री थीं। भगवान् कृष्ण के प्रयाण के बाद, जब अर्जुन द्वारका गये तो सत्यभामा तथा रुक्मिणी समेत सारी रानियाँ कृष्ण के लिए अत्यधिक शोक कर रही थीं। अपने जीवन के अन्त-समय में, उन्होंने जंगल में जाकर कठिन तपस्या की।

सत्यभामा ने अपने पति को उकसाया कि वे स्वर्गलोक से पारिजात पुष्प लायें और भगवान् ने बलपूर्वक देवताओं से उसे प्राप्त किया, ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक सामान्य पति अपनी पत्नी को रिझाने के लिए इच्छित वस्तुएँ लाता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि भगवान् को सामान्य व्यक्ति की भाँति अपनी पत्नियों के आदेशों को पूरा करने की आवश्यकता न थी, लेकिन चूँकि रानियों ने उच्चकोटि की भक्ति—भगवान् की शुश्रूषा—करना स्वीकार किया था, अतएव भगवान् भी आज्ञाकारी पति की भूमिका निभा रहे थे। पृथ्वी का कोई भी व्यक्ति स्वर्गलोक की कोई वस्तु और वह भी पारिजात पुष्प प्राप्त करने की बात सोच भी नहीं सकता, क्योंकि उसका उपयोग केवल देवता करते हैं।

लेकिन भगवान् की आज्ञाकारिणी पत्नियाँ होने के कारण, रानियों को भी स्वर्ग के निवासियों की पत्नियों जैसा विशेषाधिकार प्राप्त था। दूसरे शब्दों में, भगवान् अपनी सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, अतएव द्वारका की रानियों के लिए ब्रह्माण्ड की किसी भी दुर्लभ वस्तु को प्राप्त कर पाना आश्चर्यजनक नहीं था।

 
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