श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
कच्चित् प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना ।
शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
कच्चित्—कहीं; प्रेष्ठ-तमेन—सर्वाधिक प्रिय को; अथ—मेरा भाई अर्जुन; हृदयेन—अत्यन्त घनिष्ठ; आत्म-बन्धुना—अपने मित्र कृष्ण से; शून्य:—शून्य; अस्मि—हूँ; रहित:—खोकर; नित्यम्—सदा के लिए; मन्यसे—तुम सोचते हो; ते—तुम्हारा; अन्यथा—अन्यथा; न—कभी नहीं; रुक्—मानसिक ताप ।.
 
अनुवाद
 
 अथवा कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम इसलिए रिक्त अनुभव कर रहे हो, क्योंकि तुमने अपने घनिष्ठ मित्र भगवान् कृष्ण को खो दिया हो? हे मेरे भ्राता अर्जुन, तुम्हारे इतने हताश होने का मुझे कोई अन्य कारण नहीं दिखता।
 
तात्पर्य
 विश्व की विसंगतियों के कारण के विषय में महाराज युधिष्ठिर की सारी जिज्ञासाओं का अन्दाज विश्व की दृष्टि से भगवान् कृष्ण के अन्तर्धान होने के आधार पर लगाया गया था। और अब अर्जुन की घोर निराशा के कारण उसे उन्होंने प्रकट कर दिया, जो अन्यथा सम्भव नहीं हो पाता। अतएव इसके बारे में संशयग्रस्त होते हुए भी, श्रीनारद के संकेत के अनुसार, उन्हें अर्जुन से स्पष्ट पूछने के लिए बाध्य होना पड़ा।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के अन्तर्गत ‘भगवान् कृष्ण का अन्तर्धान होना’ नामक चौदहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥