श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
युधिष्ठिर उवाच
सम्प्रेषितो द्वारकायां जिष्णुर्बन्धुदिद‍ृक्षया ।
ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम् ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
युधिष्ठिर: उवाच—महाराज युधिष्ठिर ने कहा; सम्प्रेषित:—गया हुआ है; द्वारकायाम्—द्वारका; जिष्णु:—अर्जुन; बन्धु—मित्रों से; दिदृक्षया—मिलने के लिए; ज्ञातुम्—जानने के लिए; च—भी; पुण्य-श्लोकस्य—भगवान् का; कृष्णस्य—श्रीकृष्ण का; च—तथा; विचेष्टितम्—कार्यक्रम ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई भीमसेन से कहा : मैंने अर्जुन को द्वारका भेजा था कि वह अपने मित्रों से भेंट कर आये और भगवान् श्रीकृष्ण से उनका कार्यक्रम जानता आये।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥