श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 14: भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तर्धान होना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.14.9 
यस्मान्न: सम्पदो राज्यं दारा: प्राणा: कुलं प्रजा: ।
आसन्सपत्नविजयो लोकाश्च यदनुग्रहात् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
यस्मात्—जिससे; न:—हमारा; सम्पद:—ऐश्वर्य; राज्यम्—राज्य; दारा:—पत्नियाँ; प्राणा:—जीवनाधार; कुलम्—वंश; प्रजा:—प्रजागण; आसन्—सम्भव हुए; सपत्न—प्रतियोगी; विजय:—जीतकर; लोका:—उच्च लोकों में भावी निवास; च— तथा; यत्—जिसके; अनुग्रहात्—अनुग्रह से ।.
 
अनुवाद
 
 केवल उन्हीं से हमारा सारा राजसी ऐश्वर्य, अच्छी पत्नियाँ, जीवन, सन्तान, प्रजा के ऊपर नियंत्रण, शत्रुओं पर विजय तथा उच्चलोकों में भावी निवास, सभी कुछ सम्भव हो सका। यह सब हम पर उनकी अहैतुकी कृपा के कारण है।
 
तात्पर्य
 भौतिक सम्पन्नता में अच्छी पत्नी, अच्छा घर, पर्याप्त भूमि, अच्छी सन्तानें, राजसी पारिवारिक सम्बन्ध, प्रतियोगियों पर विजय तथा पुण्य कर्म के द्वारा भौतिक सुविधाओं की बेहतर व्यवस्था के लिए उच्चतर दैवी लोकों में निवासस्थान की प्राप्ति सम्मिलित हैं। ये सुविधाएँ न केवल खुद के कठोर श्रम से या अनुचित साधनों से प्राप्त की जाती हैं, अपितु भगवान् की कृपा से प्राप्त होती हैं। किसी के निजी उद्यम से अर्जित सम्पन्नता भी भगवान् की कृपा पर ही निर्भर करती है। भगवान् के आशीर्वाद के साथ-साथ निजी श्रम तो होना ही चाहिए, किन्तु भगवान् के आशीर्वाद के बिना केवल श्रम से ही किसी को सफलता नहीं मिलती। कलियुग का आधुनिकता-प्रिय व्यक्ति निजी उद्यम में विश्वास करता है और परमेश्वर के आशीर्वाद को नकारता है। यहाँ तक कि भारत के एक महान् संन्यासी ने शिकागो में दिये गये अपने भाषण में परमेश्वर के आशीर्वादों का विरोध किया। लेकिन जहाँ तक वैदिक शास्त्रों का सम्बन्ध है, जैसा कि श्रीमद्भागवत के पृष्ठों में देखने में आता है, सभी प्रकार की सफलता का अन्तिम अधिकार परमेश्वर के हाथों में रहता है। महाराज युधिष्ठिर अपनी निजी सफलता के प्रसंग में इस सत्य को स्वीकार करते हैं। अतएव मनुष्य के लिए करने योग्य यही होगा कि वह महान् राजा एवं भगवान् के भक्त के पदचिह्नों का अनुसरण करे, जिससे उसका जीवन पूर्णतया सफल बने। यदि भगवान् की मर्जी के बिना कोई सफलता प्राप्त कर सकता था, तो कोई भी चिकित्सक (वैद्य) अपने रोगी को चंगा करने में असफल न होता। आधुनिकतम चिकित्सक के द्वारा रोगी की उन्नत चिकित्सा होने पर भी उसकी मृत्यु होती है, किन्तु कभी-कभी अत्यन्त आशाहीन रोगी बिना किसी उपचार के आश्चर्यजनक रूप में चंगा हो जाता है। अतएव निष्कर्ष यह निकला कि सारी घटनाएँ, चाहे अच्छी हों या बुरी, भगवान् की मर्जी के कारण ही घटती हैं। किसी भी सफल व्यक्ति को अपनी सफलता के लिए भगवान् के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥