श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
सूत उवाच
एवं कृष्णसख: कृष्णो भ्रात्रा राज्ञा विकल्पित: ।
नानाशङ्कास्पदं रूपं कृष्णविश्लेषकर्शित: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; कृष्ण-सख:—कृष्ण का विख्यात मित्र; कृष्ण:—अर्जुन; भ्रात्रा— अपने बड़े भाई; राज्ञा—राजा युधिष्ठिर द्वारा; विकल्पित:—सोचा गया; नाना—विविध; शङ्का-आस्पदम्—अनेक संशयों पर आधारित; रूपम्—रूप; कृष्ण—भगवान् श्रीकृष्ण की; विश्लेष—वियोग की भावना से; कर्शित:—अत्यन्त दुखी ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : भगवान् कृष्ण का विख्यात मित्र अर्जुन, महाराज युधिष्ठिर की सशंकित जिज्ञासाओं के अतिरिक्त भी, कृष्ण के वियोग की प्रबल अनुभूति के कारण शोक- संतप्त था।
 
तात्पर्य
 अत्यधिक संतप्त होने के कारण, अर्जुन का गला रुँध-सा गया, अतएव वह महाराज युधिष्ठिर की विभिन्न सशंकित जिज्ञासाओं का ठीक से उत्तर नहीं दे पा रहा था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥