हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.15.10 
पत्‍न्‍यास्तवाधिमखक्लृप्तमहाभिषेक-
श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवै: सभायाम् ।
स्पृष्टं विकीर्य पदयो: पतिताश्रुमुख्या
यस्तत्स्त्रियोऽकृतहतेशविमुक्तकेशा: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
पत्न्या:—पत्नी का; तव—आपकी; अधिमख—विशाल यज्ञोत्सव के समय; क्ऌप्त—वस्त्राभूषित; महा-अभिषेक—अच्छी तरह पवित्र की गई; श्लाघिष्ठ—इस प्रकार महिमावान; चारु—सुन्दर; कबरम्—बालों की चोटी; कितवै:—दुष्टों के द्वारा; सभायाम्—सभा में; स्पृष्टम्—पकड़ी जाने पर; विकीर्य—खोलकर; पदयो:—पैरों पर; पतित-अश्रु-मुख्या:—आँखों में अश्रु भरकर चरणों में गिरी हुई का; य:—वह; तत्—उनकी; स्त्रिय:—पत्नियाँ; अकृत—हो गई; हत-ईश—पतिविहीन; विमुक्त- केशा:—खुले हुए बाल ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने ही उन दुष्टों की पत्नियों के बाल खोल दिये, जिन्होंने आपकी महारानी (द्रौपदी) की उस चोटी को खोलने का दुस्साहस किया था, जो महान् राजसूय-यज्ञ अनुष्ठान के अवसर पर सुन्दर ढंग से सजाई तथा पवित्र की गई थी। उस समय वह अपनी आँखों में आँसू भर कर भगवान् कृष्ण के चरणों पर गिर पड़ी थी।
 
तात्पर्य
 रानी द्रौपदी की चोटी अत्यन्त सुन्दर थी, जिसे राजसूय यज्ञ के अवसर पर पवित्र किया गया था। किन्तु जब वे दाँव में हारी जा चुकी थी, तो दु:शासन ने उनके महिमा-मण्डित केशों को छूकर, उनका अपमान किया था। तब द्रौपदी भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर गिर पड़ी, अत: भगवान् कृष्ण ने निश्चय किया कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध के फलस्वरूप दु:शासन तथा उसके दलवालों की सारी पत्नियों के केश खुलवाकर रहेंगे। इस प्रकार कुरुक्षेत्र के युद्ध के पश्चात्, जब धृतराष्ट्र के सारे पुत्र तथा पौत्र युद्ध में मारे जा चुके थे, तो परिवार की सारी स्त्रियों को विधवाओं के रूप में केश खोलने पड़े। दूसरे शब्दों में, दु:शासन द्वारा भगवान् के महान् भक्त का अपमान किये जाने से ही कुरुवंश की सारी स्त्रियाँ विधवा हो गईं। भगवान् भले ही अपने ऊपर किसी दुष्ट द्वारा किये गये अपमान को सह लें, क्योंकि पिता अपने पुत्र के द्वारा किये गये अपमान को सह लेता है, किन्तु वे अपने भक्तों का अपमान कभी नहीं सहते। महान् आत्मा का अपमान करने पर मनुष्य को अपने सारे पुण्यों तथा वरों की बलि दे देनी पड़ती है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to  वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.
   
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥