श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि ष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्ध: ।
सख्यु: सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं सेहे महान्महितया कुमतेरघं मे ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
शय्या—एक ही बिस्तर पर सोना; आसन—एक ही आसन पर बैठना; अटन—साथ-साथ घूमना; विकत्थन—आत्मश्लाघा; भोजन—साथ-साथ खाना; आदिषु—इत्यादि में; ऐक्यात्—एकत्व होने से; वयस्य—हे मित्र; ऋतवान्—सत्यवादी; इति—इस प्रकार; विप्रलब्ध:—बुरा आचरण किया गया; सख्यु:—मित्र से; सखा इव—मित्र की भाँति; पितृवत्—पिता की भाँति; तनयस्य—बालक का; सर्वम्—सारे; सेहे—सह लेते; महान्—महान्; महितया—यश से; कुमते:—दुर्बुद्धि का; अघम्— अपराध; मे—मेरे ।.
 
अनुवाद
 
 सामान्यत: हम दोनों साथ-साथ रहते और सोते, साथ-साथ बैठते और घूमने जाते। और बहादुरी के कार्यों के लिए आत्म-प्रशंसा करते हुए कभी-कभी यदि कोई भूल होती, तो मैं उन्हें यह कहकर चिढ़ाया करता था “हे मित्र, तुम तो बड़े सत्यवादी हो।” उस समय भी जब उनका महत्व घटता होता, वे परमात्मा होने के कारण, मेरी उटपटांग बातों को सह लेते थे और मुझे उसी प्रकार क्षमा कर देते थे जिस तरह एक सच्चा मित्र अपने सच्चे मित्र को या पिता अपने पुत्र को क्षमा कर देता है।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् श्रीकृष्ण परम-पूर्ण हैं, अतएव शुद्ध भक्तों के साथ उनकी दिव्य लीलाओं में किसी तरह की कमी नहीं रहती, चाहे वह मित्र, पुत्र या प्रेमी के रूप में हों। भगवान् अपने मित्रों, माता-पिता या प्रेमिकाओं की झिड़कियों में बड़े-बड़े विद्वानों तथा धर्म-विशारदों द्वारा विधिपूर्वक अर्पित की जानेवाली वैदिक ऋचाओं से भी अधिक आनन्द उठाते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥