श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
शोकेन शुष्यद्वदनहृत्सरोजो हतप्रभ: ।
विभुं तमेवानुस्मरन्नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
शोकेन—विरह से; शुष्यत्-वदन—सूखता मुँह; हृत्-सरोज:—कमल-सदृश हृदय; हत—विहीन; प्रभ:—शारीरिक कान्ति; विभुम्—परम; तम्—भगवान् कृष्ण को; एव—निश्चय ही; अनुस्मरन्—भीतर ही भीतर सोचते हुए; न—नहीं; अशक्नोत्— समर्थ हो सका; प्रतिभाषितुम्—ठीक से उत्तर देने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 शोक से अर्जुन का मुँह तथा कमल-सदृश हृदय सूख चुके थे, अतएव उसकी शारीरिक कान्ति चली गई थी। अब भगवान् का स्मरण करने पर, वह उत्तर में एक शब्द भी न बोल पाया।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥