श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
सोऽहं नृपेन्द्र रहित: पुरुषोत्तमेन
सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्य: ।
अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन्
गोपैरसद्भ‍िरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
स:—वह; अहम्—मैं; नृप-इन्द्र—हे सम्राट; रहित:—विहीन; पुरुष-उत्तमेन—परमेश्वर द्वारा; सख्या—अपने मित्र द्वारा; प्रियेण—अपने सर्वाधिक प्रिय द्वारा; सुहृदा—शुभचिन्तक द्वारा; हृदयेन—हृदय तथा आत्मा से; शून्य:—शून्य, रहित; अध्वनि—हाल ही में; उरुक्रम-परिग्रहम्—सर्वशक्तिमान की पत्नियाँ; अङ्ग—शरीर; रक्षन्—रक्षा करते हुए; गोपै:—ग्वालों द्वारा; असद्भि:—नास्तिक, असभ्य, दुष्ट; अबला इव—निर्बल स्त्री की तरह; विनिर्जित: अस्मि—पराजित हो चुका हूँ ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, अब मैं अपने मित्र तथा सर्वाधिक प्रिय शुभचिन्तक पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से विलग हो गया हूँ, अतएव मेरा हृदय हर तरह से शून्य-सा प्रतीत हो रहा है। उनकी अनुपस्थिति में, जब मैं कृष्ण की तमाम पत्नियों की रखवाली कर रहा था, तो अनेक अविश्वस्त ग्वालों ने मुझे हरा दिया।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक की सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अर्जुन किस तरह ग्वालों की असभ्य टोली द्वारा हरा दिये गये और किस तरह इन संसारी ग्वालों ने भगवान् की पत्नियों के शरीर का स्पर्श किया होगा, जिनकी रखवाली अर्जुन कर रहे थे। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने विष्णुपुराण तथा ब्रह्मपुराण से खोज करके इस विरोधाभास को मान्य ठहराया है। इन पुराणों में कहा गया है कि एक बार स्वर्ग की सुन्दरियों ने अपनी सेवा से अष्टावक्र मुनि को प्रसन्न कर लिया, तो मुनि ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हें परमेश्वर पति के रूप में प्राप्त होंगे। अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था, अतएव वे एक खास तरह से झुककर टेढ़ा चलते थे। फलत: देवताओं की पुत्रियाँ उनकी चाल देखकर अपनी हँसी रोक न पाईं, तो मुनि ने क्रुद्ध होकर उन्हें शाप दिया कि यदि उन्हें पति-रूप में भगवान् प्राप्त हो भी जायें, तो भी उनका अपहरण दुष्टों के द्वारा होगा। बाद में उन कन्याओं ने स्तुतियों द्वारा मुनि को फिर से प्रसन्न किया, तो मुनि ने फिर वरदान दिया कि अपहरण होने पर भी, उन्हें अपने अपने पति वापस मिल जायेंगे। अतएव मुनि के वचनों को सही बनाने के लिए स्वयं भगवान् ने अपनी पत्नियों का अपहरण अर्जुन की सुरक्षा में रहते हुए भी कर लिया, अन्यथा उन दुष्टों के स्पर्श करते ही सारी की सारी पत्नियाँ अदृश्य हो गई होतीं। इसके साथ ही जिन गोपियों ने कृष्ण की पत्नी बनने के लिए प्रार्थना की थी, वे भी अपनी-अपनी इच्छा पूरी होने पर अपने-अपने स्थानों पर लौट आईं। भगवान् कृष्ण के प्रस्थान के बाद उन्होंने चाहा कि उनके सारे संगी भगवद्धाम वापस आ जाँय और वे सभी विभिन्न अवस्थाओं में वापस बुला लिए गये।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥