श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
तद्वै धनुस्त इषव: स रथो हयास्ते
सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति ।
सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं
भस्मन्हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वही; वै—निश्चय ही; धनु:—धनुष; ते इषव:—वही तीर; स:—वही; रथ:—रथ; हया: ते—वे ही घोड़े; स: अहम्—मैं वही अर्जुन हूँ; रथी—रथारूढ़ वीर; नृपतय:—सारे राजा; यत:—जिनको; आनमन्ति—नमस्कार किया करते थे; सर्वम्—सब; क्षणेन—एक क्षण भर में; तत्—वे सब; अभूत्—हो गये; असत्—व्यर्थ; ईश—ईश्वर के कारण; रिक्तम्—रिक्त होने से; भस्मन्—राख; हुतम्—घी की आहुति; कुहक-राद्धम्—जादूगरी से उत्पन्न धन; इव—सदृश; उप्तम्—बोया हुआ; ऊष्याम्— बंजर भूमि में ।.
 
अनुवाद
 
 मेरे पास वही गाण्डीव धनुष है, वे ही तीर हैं, उन्हीं घोड़ों के द्वारा खींचा जानेवाला वही रथ है और उन्हें इस्तेमाल करनेवाला मैं वही अर्जुन हूँ, जिसके सामने सारे राजा सिर झुकाया करते थे। किन्तु भगवान् कृष्ण की अनुपस्थिति में वे सब एक ही क्षण में शून्य हो गये हैं। यह वैसा ही है जैसे राख में घी की आहूति डालना, जादू की छड़ी से धन एकत्र करना या बंजर भूमि में बीज बोना।
 
तात्पर्य
 जैसाकि हम कई बार कह चुके हैं कि किसी को उधार ली गई पगड़ी पर गर्व नहीं करना चाहिए। सारी शक्तियाँ तथा बल परम स्रोत भगवान् कृष्ण से प्राप्त होते हैं। वे सब तब तक कार्यशील रहते हैं, जब तक भगवान् की इच्छा रहती है। उनके न चाहने पर, वे सब समाप्त हो जाते हैं। जिस तरह सारी विद्युत् शक्ति बिजलीघर से प्राप्त होती है और ज्योंही बिजलीघर विद्युत् ऊर्जा देना बन्द कर देता है कि सारे बल्ब बेकार हो जाते हैं। ऐसी शक्तियाँ भगवान् की इच्छा से क्षण भर में उत्पन्न की जा सकती हैं या वापस ली जा सकती हैं। भगवान् के आशीष के बिना आधुनिक सभ्यता मात्र बच्चों का खेल है। जब तक माता-पिता बच्चे को खेलने देते हैं, तब तक सब कुछ ठीक-ठाक रहता है, लेकिन ज्योंही माता-पिता अपनी अनुमति वापस ले लेते हैं, बच्चे को खेलना बन्द करना पड़ता है। मानवीय सभ्यता तथा इसके सारे कार्यकलापों को भगवान् के परम आशीष का अनुगमन करना चाहिए। इस आशीष के बिना मानवीय सभ्यता की सारी प्रगति किसी शव को सजाने जैसा ही है। यहाँ पर कहा गया है कि मृत सभ्यता तथा उसके कार्यकलाप राख में घी डालने के तुल्य, जादू की छड़ी से धन जुटाने के तुल्य या बंजर भूमि में बीज बोने के तुल्य हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥