श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक
राजंस्त्वयानुपृष्टानां सुहृदां न: सुहृत्पुरे ।
विप्रशापविमूढानां निघ्नतां मुष्टिभिर्मिथ: ॥ २२ ॥
वारुणीं मदिरां पीत्वा मदोन्मथितचेतसाम् ।
अजानतामिवान्योन्यं चतु:पञ्चावशेषिता: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
राजन्—हे राजन्; त्वया—आपके द्वारा; अनुपृष्टानाम्—पूछे गये; सुहृदाम्—मित्रों तथा सम्बन्धियों का; न:—हमारे; सुहृत्- पुरे—द्वारका नगरी में; विप्र—ब्राह्मण के; शाप—शाप से; विमूढानाम्—मूर्खों का; निघ्नताम्—मारे हुओं का; मुष्टिभि:— लाठियों द्वारा; मिथ:—परस्पर; वारुणीम्—खमीर उठे चावल को; मदिराम्—शराब को; पीत्वा—पीकर; मद-उन्मथित—नशे में आकर; चेतसाम्—मानसिक स्थिति का; अजानताम्—न जानते हुए; इव—सदृश; अन्योन्यम्—एक दूसरे को; चतु:—चार; पञ्च—पाँच; अवशेषिता:—अब बचे हुए ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, चूँकि आपने द्वारका नगरी के हमारे मित्रों तथा सम्बन्धियों के विषय में पूछा है, अतएव मैं आपको सूचित कर रहा हूँ कि वे सब ब्राह्मणों द्वारा शापित होकर, सड़े हुए चावलों से बनी शराब पीकर उन्मत्त हो उठे और एक-दूसरे को न पहचानने के कारण लाठियाँ लेकर परस्पर लडऩे लगे। अब केवल चार-पाँच को छोडक़र शेष सभी मर चुके हैं।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥