श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक
जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयस: ।
दुर्बलान्बलिनो राजन्महान्तो बलिनो मिथ: ॥ २५ ॥
एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भ‍िरितरान् विभु: ।
यदून्यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सञ्जहार ह ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
जलौकसाम्—जलचरों का; जले—जल में; यद्वत्—जिस तरह; महान्त:—बड़ा प्राणी; अदन्ति—निगल जाते हैं; अणीयस:— छोटा प्राणी; दुर्बलान्—दुर्बल को; बलिन:—बलवान; राजन्—हे राजन्; महान्त:—सबसे बलवान; बलिन:—कम बली; मिथ:—द्वन्द्व में; एवम्—इस तरह; बलिष्ठै:—सर्वाधिक बलवान द्वारा; यदुभि:—यदुवंशियों द्वारा; महद्भि:—सर्वाधिक शक्तिशाली; इतरान्—सामान्य लोग; विभु:—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; यदून्—सारे यदुवंशियों; यदुभि:—यदुओं द्वारा; अन्योन्यम्—परस्पर; भू-भारान्—धरती का भार; सञ्जहार—उतार दिया; ह—भूतकाल में ।.
 
अनुवाद
 
 हे राजन्, जिस तरह समुद्र में बड़े तथा बलशाली जलचर, छोटे-मोटे तथा निर्बल जलचरों को निगल जाते हैं, उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने भी धरती का भार हलका करने के लिए, निर्बल यदु को मारने के लिए बलशाली यदु को और छोटे यदु को मारने के लिए बड़े यदु को भिड़ा दिया है।
 
तात्पर्य
 भौतिक जगत का नियम है—जीवन टिकाए रखने के लिए संघर्ष एवं योग्यतम का बचे रहना—क्योंकि भौतिक जगत में बद्धजीवों के मध्य असमानता है, जो भौतिक साधनों पर प्रभुता जताने की इच्छा के कारण है। भौतिक प्रकृति पर प्रभुता जताने की यही प्रवृत्ति बद्ध जीवन का मूल कारण है। ऐसे बनावटी प्रभुओं की सुविधा के लिए ही भगवान् की भ्रामक शक्ति ने बद्धजीवों में प्रत्येक योनि के अन्तर्गत सबल तथा निर्बल की सृष्टि करके अन्तर उत्पन्न कर दिया है। भौतिक प्रकृति तथा सृष्टि पर प्रभुता जताने से ही असमानता की सृष्टि हुई और इसीसे जीवन-संघर्ष का नियम आया। आध्यात्मिक जगत में न तो ऐसी असमानता होती है, न ऐसा जीवन-संघर्ष होता है। आध्यात्मिक जगत में जीवन संघर्ष इसलिए नहीं रहता, क्योंकि वहाँ प्रत्येक व्यक्ति का अस्तित्व शाश्वत है। वहाँ असमानता इसलिए नहीं रहती, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर की सेवा करना चाहता है और कोई भी खुद लाभ लेने के लिए भगवान् बनने की नकल नहीं करता। भगवान् हर वस्तु के, यहाँ तक कि जीवों के भी स्रष्टा होने के कारण प्रत्येक वस्तु के भोक्ता हैं, लेकिन भौतिक जगत में माया के जादू से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ का यह नित्य सम्बन्ध भुला दिया जाता है। अतएव जीव ‘जीवन टिकाए रखने के लिए संघर्ष’ तथा ‘योग्यतम का बचे रहना’ नियमों के द्वारा बद्ध हो जाता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥