श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
सूत उवाच
एवं चिन्तयतो जिष्णो: कृष्णपादसरोरुहम् ।
सौहार्देनातिगाढेन शान्तासीद्विमला मति: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
सूत: उवाच—सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्—इस प्रकार; चिन्तयत:—उपदेशों का चिन्तन करते हुए; जिष्णो:—भगवान् के; कृष्ण-पाद—कृष्ण के चरण; सरोरुहम्—कमलों की तरह के; सौहार्देन—घनिष्ठ मित्रता से; अति-गाढेन—अत्यधिक घनिष्ठता में; शान्ता—शान्त; आसीत्—हो गया; विमला—किसी भौतिक कल्मष का रंच भी नहीं; मति:—मन ।.
 
अनुवाद
 
 सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार भगवान् के उपदेश, जो अत्यधिक घनिष्ठ मित्रता में प्रदान किये गये थे उसके विषय में सोचने में तथा उनके चरणकमलों का चिन्तन करने में तल्लीन अर्जुन का मन शान्त और समस्त भौतिक कल्मष से रहित हो गया।
 
तात्पर्य
 चूँकि भगवान् परम पूर्ण हैं, अतएव उनका गहन ध्यान यौगिक समाधि के समान ही है। भगवान् अपने नाम, रूप, गुण, लीलाओं, पार्षदों तथा विशिष्ट कर्मों से अभिन्न हैं। अर्जुन भगवान् कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्ध-स्थल में उसे दिये गये उपदेशों का चिन्तन करने लगा। उन्हीं उपदेशों से अर्जुन के मन का भौतिक कल्मष नष्ट होने लगा। भगवान् सूर्य के समान हैं। सूर्योदय का अर्थ है अंधकार या अज्ञान का तत्काल दूर होना और भक्त के मन में भगवान् के प्राकट्य से तुरन्त ही कष्टप्रद भौतिक प्रभाव दूर हो जाते हैं। अतएव संसार के समस्त कल्मष से सुरक्षा के लिए भगवान् चैतन्य ने भगवान् के नाम का निरन्तर कीर्तन करने के लिए संस्तुति की है। निस्सन्देह, भक्त के लिए भगवान् का वियोग कष्टप्रद होता है। लेकिन इसका सम्बन्ध भगवान् से है, अतएव इसका विशेष दिव्य प्रभाव पड़ता है, जो हृदय को शान्त बनाता है। वियोग की अनुभूति दिव्य आनन्द का स्रोत भी बनती है और इसकी तुलना कभी भी कलुषित भौतिक वियोग से नहीं की जा सकती।
 
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