श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
ययाहरद् भुवो भारं तां तनुं विजहावज: ।
कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितु: समम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
यया—जिससे; अहरत्—छीन लिया; भुव:—संसार का; भारम्—भार, बोझा; ताम्—उस; तनुम्—शरीर को; विजहौ—त्याग दिया; अज:—अजन्मा ने; कण्टकम्—काँटे को; कण्टकेन—काँटे से; इव—सदृश; द्वयम्—दोनों; च—भी; अपि—यद्यपि; ईशितु:—नियंत्रण करते हुए; समम्—समान ।.
 
अनुवाद
 
 सर्वोपरि अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण ने यदुवंश के सदस्यों से अपना-अपना शरीर त्याग करवा दिया और इस तरह उन्होंने पृथ्वी के भार को उतारा। यह कार्य काँटे को काँटे से निकालने जैसा था, यद्यपि नियन्ता के लिए दोनों एक से हैं।
 
तात्पर्य
 श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताते हैं कि शौनक तथा अन्य ऋषि जो नैमिषारण्य में सूत गोस्वामी से श्रीमद्भागवत सुन रहे थे, यदुओं के इस प्रकार मदोन्मत्त होकर मरने की बात सुनकर प्रसन्न नहीं थे। अतएव उनकी मनोव्यथा को दूर करने के लिए सूत गोस्वामी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि भगवान् ने यदुवंश के सदस्यों से अपना शरीर त्याग करवा दिया, जिससे वे संसार के भार को हल्का कर सकें। भगवान् तथा उनके नित्य संगी इस धरा पर पृथ्वी का भार उतारने में प्रशासनिक देवताओं की सहायता करने के लिए प्रकट हुए थे। अतएव उन्होंने अपने कतिपय विश्वासपात्र देवताओं को यदुवंश में प्रकट होने और उन्हें अपने महान् उद्देश्य में सेवा करने के लिए बुलाया था। उद्देश्य पूरा हो जाने पर भगवान् की इच्छा से देवताओं ने मदोन्मत्त होकर परस्पर लड़भिड़ कर अपने भौतिक शरीर त्याग दिये। देवता सोमरस पीने के अभ्यस्त हैं, अतएव शराब तथा मादक द्रव्यों का सेवन उनसे अछूता नहीं है। कभी-कभी उन्हें उन्मत्तता के कारण कष्ट उठाने पड़े थे। एक बार मदोन्मत्त होने के कारण कुबेर के पुत्र नारद के शाप-भाजन बने, लेकिन बाद में भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से उन्हें असली रूप प्राप्त हो सका। यह कथा दशम स्कंध में मिलेगी। परमेश्वर के लिए असुर तथा देवता (सुर) दोनों समान हैं, लेकिन देवता भगवान् के आज्ञाकारी हैं, किन्तु असुर नहीं हैं। अतएव काँटे से काँटा निकालने का उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त है। एक काँटा जो भगवान् के पाँव में चुभता है, वह निश्चय ही उन्हें कष्टदायक है और दूसरा काँटा जो पीड़ादायक तत्त्वों को निकालता है, निश्चय ही भगवान् की सेवा करता है। यद्यपि प्रत्येक जीव भगवान् का अंश है, फिर भी जो भगवान् को चुभता है, वह असुर है और जो स्वेच्छा से सेवक है, वह देवता कहलाता है। भौतिक जगत में देवता तथा असुर सदा ही लड़ते रहते हैं और देवता सदा ही भगवान् द्वारा असुरों के हाथों से बचाये जाते हैं। ये दोनों ही भगवान् के नियंत्रण में रहते हैं। यह संसार दो प्रकार के जीवों से भरा हुआ है और भगवान् का उद्देश्य सदैव देवताओं की रक्षा करना तथा जब भी संसार में आवश्यकता होती है तब असुरों का विनाश करना है। इस तरह दोनों का कल्याण होता है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥