श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन् ।
नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
सख्यम्—शुभचिन्तन; मैत्रीम्—आशीर्वाद; सौहृदम्—घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित; च—भी; सारथ्य-आदिषु—सारथी बनने आदि में; संस्मरन्—इन सबों को स्मरण करते हुए; नृपम्—राजा से; अग्रजम्—बड़ा भाई; इति—इस प्रकार; आह—कहा; बाष्प— उसासें भरते; गद्गदया—अभिभूत होकर; गिरा—वाणी से ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् कृष्ण को तथा उनकी शुभकामनाओं, आशीषों, घनिष्ठ पारिवारिक सम्बन्ध एवं उनके रथ हाँकने का स्मरण करके, अर्जुन का गला रुँध आया और वह भारी साँस लेता हुआ बोलने लगा।
 
तात्पर्य
 परम पुरुष अपने शुद्ध भक्त के साथ सारे सम्बन्धों में पूर्ण हैं। श्री अर्जुन भगवान् के विशिष्ट भक्तों में से हैं, जो सख्य भाव का आदान-प्रदान कर रहे हैं और अर्जुन के साथ भगवान् का व्यवहार सर्वोच्च कोटि की मित्रता को प्रदर्शित करता है। वे अर्जुन के न केवल शुभचिन्तक थे, अपितु उसको लाभ प्रदान करने वाले भी थे और इसे अधिक परिपूर्ण बनाने के लिए उन्होंने सुभद्रा का विवाह उससे करके, उसे पारिवारिक सम्बन्ध में भी बाँध लिया था। इसके भी ऊपर, भगवान् ने अपने मित्र की युद्ध के संकटों से रक्षा करने के लिए अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया था और जब उन्होंने पाण्डवों को विश्व पर शासन करने के लिए स्थापित कर दिया, तो वे सचमुच प्रसन्न हुए थे। अर्जुन ने यह सब एक के बाद एक स्मरण किया और इस तरह ऐसे विचारों से अभिभूत हो गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥