श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
त्रित्वे हुत्वा च पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनि: ।
सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
त्रित्वे—तीनों गुणों में; हुत्वा—आहुति करके; च—भी; पञ्चत्वम्—पाँच तत्त्व; तत्—वह; च—भी; एकत्वे—एक अविद्या में; अजुहोत्—लीन हो गया; मुनि:—विचारवान; सर्वम्—कुल मिलाकर; आत्मनि—आत्मा में; अजुहवीत्—स्थिर; ब्रह्मणि— आत्मा में; आत्मानम्—आत्मा को; अव्यये—कभी न समाप्त होने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार उन्होंने पंचत्त्वमय स्थूल शरीर को विनष्ट करके, प्रकृति के तीन गुणों में मिलाकर उसे अज्ञानता में मिला दिया और तब उस अज्ञानता को आत्मा या ब्रह्म में विलीन कर दिया, जो सर्वदा अक्षय है।
 
तात्पर्य
 इस भौतिक संसार में जो कुछ व्यक्त है, वह महत् तत्त्व अव्यक्त का प्रतिफल है और हमें जितनी वस्तुएँ दृष्टिगोचर होती हैं, वे ऐसे विविध भौतिक पदार्थों के विविध संयोग हैं। लेकिन जीव ऐसे भौतिक पदार्थों से भिन्न होता है। यह तो जीव द्वारा भगवान् के नित्य दास-रूप में अपना शाश्वत स्वभाव भूलने के कारण तथा प्रकृति पर प्रभुता जताने की मिथ्या धारणा के कारण है कि उसे मिथ्या इन्द्रिय-भोग के संसार में प्रवेश करना पड़ता है। इस तरह भौतिकता द्वारा मन के प्रभावित होने का मुख्य कारण भौतिक शक्ति की साथ-साथ उत्पत्ति है। इस तरह पाँच तत्त्वों का स्थूल शरीर उत्पन्न होता है। महाराज युधिष्ठिर ने इस क्रिया को उलट दिया और उन्होंने शरीर के पाँचों तत्त्वों को भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों में मिला दिया। इससे शरीर के उत्तम, मध्यम या निकृष्ट होने का अन्तर जाता रहता है और पुन: गुणात्मक अभिव्यक्तियाँ भौतिक शक्ति में समाहित हो जाती हैं, जो शुद्ध जीव के मिथ्या भाव से उत्पन्न हैं। इस तरह जब कोई वैकुण्ठलोक के असंख्य लोकों में से किसी एक में, विशेषतया गोलोक वृन्दावन में, भगवान् का पार्षद बनना चाहता है, तो उसे निरन्तर यह सोचना होता है कि वह इस भौतिक शक्ति से भिन्न है, उसे इससे कोई सरोकार नहीं है और उसे अपनी अनुभूति शुद्ध आत्मा या ब्रह्म के रूप में करनी होती है, जो गुण में परम ब्रह्म (परमेश्वर) के तुल्य है। महाराज युधिष्ठिर ने अपना साम्राज्य परीक्षित तथा वज्र को सौंप देने के बाद उन्होंने अपने आपको न तो विश्व का सम्राट माना, न ही कुरुवंश का अग्रणी माना। भौतिक सम्बन्धों से एवं स्थूल तथा सूक्ष्म आवरणों के भौतिक बन्धन से स्वतंत्रता का यह भाव मनुष्य को भगवान् के दास के रूप में कार्य करने के लिए मुक्त बनाता है, भले ही वह अभी भौतिक जगत में रहता हो। यह अवस्था इसी भौतिक जगत में रहते हुए भी जीवन्मुक्त अवस्था कहलाती है। भौतिक अस्तित्व को समाप्त करने की विधि यही है। मनुष्य को न केवल अपने को ब्रह्म समझना चाहिए, अपितु उसे ब्रह्म के समान आचरण भी करना चाहिए। जो अपने को मात्र ब्रह्म समझता है, वह मायावादी (निर्विशेषवादी) है। किन्तु जो ब्रह्म की भाँति कर्म करता है, वह शुद्ध भक्त है।
 
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