श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 47-48
 
 
श्लोक
तद्ध्यानोद्रिक्तया भक्त्या विशुद्धधिषणा: परे ।
तस्मिन् नारायणपदे एकान्तमतयो गतिम् ॥ ४७ ॥
अवापुर्दुरवापां ते असद्भ‍िर्विषयात्मभि: ।
विधूतकल्मषा स्थानं विरजेनात्मनैव हि ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—वह; ध्यान—ध्यान; उत्रिक्तया—मुक्त होकर; भक्त्या—भक्ति से; विशुद्ध—विशुद्ध; धिषणा:—बुद्धि द्वारा; परे— अध्यात्म में; तस्मिन्—उसमें; नारायण—भगवान् श्रीकृष्ण के; पदे—चरणकमल में; एकान्त-मतय:—जो एक और अनन्य ऐसे भगवान् में स्थित हैं, उनके; गतिम्—गन्तव्य; अवापु:—प्राप्त किया; दुरवापाम्—प्राप्त करना अत्यन्त कठिन; ते—उनके द्वारा; असद्भि:—भौतिकतावादियों द्वारा; विषय-आत्मभि:—भौतिक आवश्यकताओं में लीन; विधूत—धोया हुआ; कल्मषा:— भौतिक मल; स्थानम्—धाम; विरजेन—रजोगुण से रहित; आत्मना एव—ठीक उसी शरीर से; हि—निश्चय ही ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार भक्तिभाव से निरन्तर स्मरण करने से उत्पन्न भक्तिमयी शुद्ध चेतना के द्वारा उन्होंने आदि नारायण भगवान् कृष्ण द्वारा अधिशासित वैकुण्ठलोक प्राप्त किया। यह वैकुण्ठलोक केवल उन्हें प्राप्त होता है, जो अविचल भाव से एक परमेश्वर का ध्यान धरते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का यह धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है और यह उन व्यक्तियों को प्राप्त नहीं होता, जो जीवन की भौतिक अवधारणा में लीन रहते हैं। लेकिन समस्त भौतिक कल्मष से पूर्ण रूप से शुद्ध होने के कारण पाण्डवों ने अपने इसी शरीर में उस धाम को प्राप्त किया।
 
तात्पर्य
 श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति सत्त्व, रजो तथा तमो गुणों से मुक्त हो तथा अध्यात्म में स्थित हो, तो वह शरीर-परिवर्तन हुए बिना ही जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त कर सकता है। श्रील सनातन गोस्वामी ने हरि-भक्ति-विलास नामक अपनी कृति में कहा है कि कोई भी व्यक्ति प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में आध्यात्मिक अनुशासनात्मक कर्म करके द्विजन्मा ब्राह्मण की सिद्धि प्राप्त कर सकता है, ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक रसायनशास्त्री रासायनिक प्रक्रिया से पीतल जैसी किसी धातु को सोने में बदल देता है। अतएव शरीर-परिवर्तन के बिना ही ब्राह्मण बनने या बिना शरीर-परिवर्तन के भगवद्धाम जाने में वास्तविक मार्गदर्शन का महत्त्व होता है। श्रील जीव गोस्वामी की टीका है कि यहाँ हि शब्द का उपयोग इस सत्य की पुष्टि करता है और इस वास्तविक स्थिति के विषय में कोई सन्देह नहीं है। भगवद्गीता (१४.२६) में भी श्रील जीव गोस्वामी के इस कथन की पुष्टि होती है, जब भगवान् कहते हैं कि जो अविचल भाव से विधिपूर्वक भक्ति करता है, वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के कल्मष को लाँघ करके ब्रह्मसिद्धि प्राप्त कर सकता है और जब भक्तिमय सेवा के स्वयंस्फूर्त आचरण द्वारा ब्रह्मसिद्धि को और भी उन्नत बनाया जाता है, तो इसमें जरा भी संदेह नहीं रह जाता कि उसे बिना शरीर-परिवर्तन के गोलोक वृन्दावन प्राप्त होता है, जैसा बिना शरीर-परिवर्तन के भगवान् के अपने धाम लौटने के सम्बन्ध में हम पहले ही बता चुके हैं।
 
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