श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 15: पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक
य: श्रद्धयैतद् भगवत्प्रियाणां
पाण्डो: सुतानामिति सम्प्रयाणम् ।
श‍ृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं
लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥ ५१ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो कोई; श्रद्धया—श्रद्धापूर्वक; एतत्—यह; भगवत्-प्रियाणाम्—भगवान् के अत्यन्त प्रियजनों का; पाण्डो:—पाण्डु के; सुतानाम्—पुत्रों का; इति—इस प्रकार; सम्प्रयाणम्—चरम लक्ष्य के लिए प्रस्थान; शृणोति—सुनता है; अलम्—केवल; स्वस्त्ययनम्—सौभाग्य; पवित्रम्—पूरी तरह शुद्ध; लब्ध्वा—प्राप्त करके; हरौ—भगवान् की; भक्तिम्—भक्ति को; उपैति— प्राप्त करता है; सिद्धिम्—सिद्धि को ।.
 
अनुवाद
 
 पाण्डु-पुत्रों द्वारा जीवन के परम लक्ष्य भगवद्धाम के लिए प्रस्थान का यह विषय अत्यन्त शुभ तथा परम पवित्र है। अतएव जो भी इस कथा को भक्तिभावपूर्वक सुनता है, वह जीवन की परम सिद्धि भगवद्भक्ति को निश्चय ही प्राप्त करता है।
 
तात्पर्य
 श्रीमद्भागवत पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् एवं पाण्डवों जैसे भगवद्भक्तों की कथा है। भगवान् और उनके भक्तों की कथा अपने आप में पूर्ण है। अतएव भक्तिभाव से इसे सुनना भगवान् तथा उनके नित्य-संगियों से सान्निध्य प्राप्त करने जैसा है। मनुष्य श्रीमद्भागवत का श्रवण करके जीवन की सर्वोच्च सिद्धि अर्थात् भगवद्धाम-प्रस्थान को प्राप्त कर सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के अन्तर्गत ‘पाण्डवों की सामयिक निवृत्ति’ नामक पंद्रहवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥