श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
स्वलङ्‍कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं
रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रित: पुरात् ।
वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तया
स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गत: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
सु-अलङ्कृतम्—अच्छी तरह से सजकर; श्याम—काले; तुरङ्ग—घोड़े; योजितम्—जोते हुए; रथम्—रथ को; मृग-इन्द्र— सिंह; ध्वजम्—ध्वजा लगी; आश्रित:—संरक्षण में; पुरात्—राजधानी से; वृत:—घिरा हुआ; रथ—सारथी; अश्व—अश्वारोही दल; द्विपपत्ति—हाथी; युक्तया—इस तरह सुसज्जित; स्व-सेनया—पैदल सेना के साथ; दिग्विजयाय—जीतने के लिए; निर्गत:—बाहर गया ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित काले घोड़ों द्वारा खींचे जानेवाले रथ पर सवार हो गये। उनकी ध्वजा पर सिंह का चिन्ह अंकित था। इस प्रकार सुसज्जित होकर तथा सारथियों, अश्वारोहियों, हाथीयों तथा पैदल सैनिकों से घिरे हुए, उन्होंने सभी दिशाएँ जीतने के लिए राजधानी से प्रस्थान किया।
 
तात्पर्य
 महाराज परीक्षित अपने पितामह अर्जुन से इस बात में भिन्न थे कि उनके रथ को खींचनेवाले घोड़े श्वेत रंग के न होकर काले रंग के थे। उनकी ध्वजा का चिह्न सिंह था, जबकि उनके पितामह की ध्वजा पर हनुमानजी चिह्नित थे। महाराज परीक्षित जैसा राजसी जुलूस जिसमें सुसज्जित रथ, घोड़े, हाथी, पैदल सिपाही तथा बैण्ड थे, नेत्रों को अत्यन्त सुहावना लगने वाला था, लेकिन साथ ही ऐसी सभ्यता का प्रतीक है, जो लड़ाई के मैदान में भी सौन्दर्य-परक था।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥