श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक
सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य-
वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् ।
स्‍निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णो-
र्भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १६ ॥
 
शब्दार्थ
सारथ्य—सारथी के पद की स्वीकृति; पारषद—राजसूय यज्ञ की सभा में प्रधान पद की स्वीकृति (अग्रत्व); सेवन—भगवान् की सेवा में मन को निरन्तर लगाना; सख्य—भगवान् को मित्र-रूप में सोचना; दौत्य—दूत-पद को स्वीकारना; वीर-आसन— रात्रि में हाथ में तलवार लिए रखवाले के पद की स्वीकृति; अनुगमन—चरणचिह्नों पर चलना; स्तवन—प्रार्थना करना; प्रणामान्—प्रणाम् करते हुए; स्निग्धेषु—जो लोग भगवान् की इच्छा के प्रति विनम्र हैं उनको, विनीत; पाण्डुषु—पाण्डवों में; जगत्—विश्व; प्रणतिम्—जिसकी आज्ञा का पालन किया जाय, उसको; च—तथा; विष्णो:—विष्णु की; भक्तिम्—भक्ति; करोति—करता है; नृ-पति:—राजा; चरण-अरविन्दे—भगवान् के चरणकमलों पर ।.
 
अनुवाद
 
 महाराज परीक्षित ने सुना कि जिन भगवान् कृष्ण (विष्णु) की आज्ञा का पालन सारा जगत करता है, उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से पाण्डु के विनीत पुत्रों की उनकी इच्छानुसार सभी प्रकार से सेवाएँ कीं, जिनमें सारथी बनने से लेकर अग्रपूजा ग्रहण करने तथा दूत बनने, मित्र बनने, रात्रि में रक्षक बनकर सेवाएँ करने के कार्य सम्मिलित हैं। उन्होंने सेवक की भाँति पाण्डवों की आज्ञा का पालन किया तथा आयु में छोटों की भाँति उन्हें प्रणाम किया। जब महाराज परीक्षित ने यह सब सुना, तो वे भगवान् के चरणकमलों की भक्ति से अभिभूत हो उठे।
 
तात्पर्य
 भगवान् कृष्ण पाण्डवों जैसे अनन्य भक्तों के लिए सर्वस्व हैं। वे उनके लिए परमेश्वर, गुरु, आराध्य देव, पथ-प्रदर्शक, सारथी, मित्र, सेवक, दूत तथा जो कुछ भी सोचा जा सकता है, वह सब कुछ थे। इस प्रकार भगवान् ने भी पाण्डवों की भावनाओं का प्रतिदान किया। भगवान् के शुद्ध भक्त के रूप में महाराज परीक्षित भगवान् द्वारा अपने भक्तों की भावनाओं के दिव्य आदान-प्रदान का महत्त्व समझ सकते थे और इस तरह वे स्वयं भगवान् के आचरण से अभिभूत थे। मात्र अपने शुद्ध भक्तों के साथ भगवान् के आचरण के महत्त्व को समझ लेने से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। यद्यपि भक्तों के साथ भगवान् के आचरण सामान्य मानवीय आचरण जैसे प्रतीत होते हैं, लेकिन जो उन्हें यथार्थ रूप में समझता है, वह तुरन्त ही भगवद्धाम जाने के लिए सुपात्र बन जाता है। पाण्डवजन भगवान् की इच्छा के प्रति इतने विनीत थे कि वे भगवान् की सेवा में कितनी ही शक्ति लगा सकते थे और ऐसे अनन्य संकल्प से वे इच्छित रूप में भगवान् की कृपा के भाजन बन सके थे।
 
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