श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम् ।
नातिदूरे किलाश्चर्यं यदासीत् तन्निबोध मे ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—महाराज परीक्षित का; एवम्—इस प्रकार; वर्तमानस्य—ऐसे विचारों में लीन रहकर; पूर्वेषाम्—अपने पूर्वजों में; वृत्तिम्—अच्छा कार्य; अन्वहम्—दिन-प्रतिदिन; न—नहीं; अति-दूरे—काफी दूर; किल—निश्चय ही; आश्चर्यम्— आश्चर्यजनक; यत्—वह; आसीत्—था; तत्—जो; निबोध—उसे जानो; मे—मुझसे ।.
 
अनुवाद
 
 अब तुम लोग मुझसे वह घटना सुन सकते हो, जो तब घटी, जब महाराज परीक्षित अपने पूर्वजों की उत्तम वृत्तियों के विषय में सुनते हुए तथा उन विचारों में डूबे हुए अपने दिन बिता रहे थे।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥