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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.16.19 
धर्म उवाच
कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते
विच्छायासि म्‍लायतेषन्मुखेन ।
आलक्षये भवतीमन्तराधिं
दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
धर्म: उवाच—धर्म ने पूछा; कच्चित्—क्या; भद्रे—महोदया; अनामयम्—स्वस्थ एवं प्रसन्न; आत्मन:—स्वयं; ते—आपको; विच्छाया असि—शोक की छाया से आवृत प्रतीत होते हैं; म्लायता—श्याम रंग की; ईषत्—कुछ-कुछ; मुखेन—मुख मंडल से; आलक्षये—आप दिखती हो; भवतीम्—आप; अन्तराधिम्—आन्तरिक व्याधि; दूरे—दूर स्थित; बन्धुम्—मित्र के विषय में; शोचसि—चिन्ता कर रहै हैं; कञ्चन—कोई; अम्ब—हे माता ।.
 
अनुवाद
 
 धर्म ने (बैल रूप में) पूछा : हे महोदया, आप स्वयं स्वस्थ तथा प्रसन्न तो हैं? आप शोक की छाया से आवृत क्यों हैं? आपके मुख से ऐसा लगता है कि आप म्लान पड़ गई हैं। क्या आपको कोई भीतरी रोग हो गया है या आप अपने किसी दूर स्थित सम्बन्धी के विषय में सोच रही हैं?
 
तात्पर्य
 इस कलियुग में विश्व भर के लोग सदैव चिन्ताग्रस्त रहते हैं। हर एक किसी न किसी रोग से ग्रस्त है। इस युग के लोगों के चेहरों से ही उनके मनों की बात पढ़ी जा सकती है। हर व्यक्ति, घर से दूर स्थित अपने सम्बन्धी की अनुपस्थिति का अनुभव करता है। कलियुग का विशेष लक्षण यह है कि कोई भी परिवार अब एकसाथ रहने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर पाता। जीविकोपार्जन के लिए पिता अपने पुत्र से, अथवा पत्नी अपने पति से दूर रहती है। आन्तरिक रोग, प्रियजनों से विछोह तथा पूर्ववत् स्थिति बनाये रखने की चिन्ता सबों को सताती है। ये कतिपय कारण हैं जिनसे इस युग के लोग सदैव दुखी रहते हैं।
 
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