श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम् ।
जनमेजयादींश्चतुरस्तस्यामुत्पादयत् सुतान् ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
स:—उसने; उत्तरस्य—राजा उत्तर की; तनयाम्—पुत्री को; उपयेमे—विवाह किया; इरावतीम्—इरावती को; जनमेजय- आदीन्—महाराज जनमेजय तथा अन्य; चतुर:—चार; तस्याम्—उसमें; उत्पादयत्—जन्म दिया; सुतान्—पुत्रों को ।.
 
अनुवाद
 
 राजा परीक्षित ने राजा उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया और उससे उन्हें ज्येष्ठ पुत्र महाराज जनमेजय सहित चार पुत्र प्राप्त हुए।
 
तात्पर्य
 महाराज उत्तर विराट के पुत्र तथा महाराज परीक्षित के मामा थे। इरावती महाराज उत्तर की पुत्री होने से, महाराज परीक्षित की ममेरी बहन थी, लेकिन यदि ममेरे भाइयों तथा बहिनों का गोत्र अर्थात् परिवार एक न हो, तो उन्हें विवाह करने की अनुमति होती थी। विवाह की वैदिक पद्धति में गोत्र या परिवार पर बल दिया जाता था। अर्जुन ने भी सुभद्रा से विवाह किया था, यद्यपि वह उनकी ममेरी बहिन लगती थी।

जनमेजय—राजर्षियों में से एक तथा महाराज परीक्षित के विख्यात पुत्र। इनकी माता का नाम इरावती अथवा कुछ लोगों के अनुसार माद्रवती था। महाराज जनमेजय के दो पुत्र हुए जिनके नाम थे ज्ञातानीक तथा शंकुकर्ण। उन्होंने कुरुक्षेत्र तीर्थस्थल पर अनेक यज्ञ किये। उनके तीन छोटे भाइयों के नाम श्रुतसेन, उग्रसेन तथा भीमसेन-द्वितीय थे। उन्होंने तक्षला (अजन्ता) पर आक्रमण किया और अपने महान् पिता महाराज परीक्षित को दिये गये अवैध शाप का बदला लेने का निश्चय किया। उन्होंने अपने पिता को डँसनेवाले तक्षक सहित सर्पों की सम्पूर्ण जाति को विनष्ट करने के लिए सर्प-यज्ञ किया। किन्तु अनेक प्रभावशाली देवताओं तथा मुनियों के आग्रह पर, उन्हें सम्पूर्ण सर्प जाति को विनष्ट करने का अपना निर्णय बदलना पड़ा, किन्तु यज्ञ बन्द करने के बावजूद उन्होंने यज्ञ से सम्बन्धित प्रत्येक व्यक्ति को समुचित पुरस्कार देकर उन्हें सन्तुष्ट किया। इस उत्सव में महामुनि व्यासदेव भी उपस्थित थे और उन्होंने स्वयं राजा के समक्ष कुरुक्षेत्र युद्ध का सारा वृत्तान्त सुनाया। बाद में, व्यासदेव की आज्ञा से उनके शिष्य वैशम्पायन ने राजा को महाभारत सुनाया। वे अपने पिता के असामयिक निधन से अत्यधिक दुखी थे और उन्हें दुबारा देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक रहते थे। अतएव उन्होंने महामुनि व्यासदेव से अपनी इच्छा व्यक्त की। व्यासदेव ने उनकी इच्छा पूरी की। उनके पिता उनके समक्ष उपस्थित हुए और उन्होंने अपने पिता एवं व्यासदेव का पूजन बड़े ही आदर तथा धूमधाम से किया। उन्होंने उस यज्ञ में उपस्थित समस्त ब्राह्मणों को अत्यन्त प्रसन्न होकर मुक्तहस्त दान दिया।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥