श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार
कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि ।
अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा
कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
यद्वा—हो सकता है; अम्ब—हे माता; ते—आपका; भूरि—भारी; भर—बोझा; अवतार—बोझा घटाना; कृत—किया गया; अवतारस्य—अवतारी; हरे:—भगवान् श्रीकृष्ण का; धरित्रि—हे पृथ्वी; अन्तर्हितस्य—दृष्टि से ओझल भगवान् का; स्मरती— सोचते हुए; विसृष्टा—किया गया सब कुछ; कर्माणि—कर्म; निर्वाण—मोक्ष; विलम्बितानि—जो निहित हो ।.
 
अनुवाद
 
 हे माता पृथ्वी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि ने तुम्हारे भारी बोझ को उतारने के लिए ही श्रीकृष्ण के रूप में स्वयं अवतार लिया। यहाँ के उनके सारे कार्य दिव्य हैं और वे मोक्ष-पथ को पक्का करनेवाले हैं। अब आप उनकी उपस्थिति से विहीन हो गई हैं। शायद अब आप उन्हीं कार्यों को सोच रही हैं और उनकी अनुपस्थिति में दुखी हो रही हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् के कार्यों में मोक्ष सम्मिलित है, किन्तु वे किसी निर्वाण या मोक्ष से प्राप्त होनेवाले आनन्द से अधिक आनन्ददायी हैं। श्रील जीव गोस्वामी तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के मतानुसार, यहाँ पर प्रयुक्त शब्द निर्वाण-विलम्बितानि का अर्थ है, “मोक्ष के महत्त्व को कम करनेवाला” निर्वाण अर्थात् मुक्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कठोर तपस्या करनी होती है, लेकिन भगवान् इतने दयालु हैं कि वे पृथ्वी का भार कम करने के लिए अवतरित होते हैं। मनुष्य ऐसे कार्यों को केवल स्मरण करके निर्वाण से प्राप्त होनेवाले सुख को लात मार कर, भगवान् का सान्निध्य पाने और वहाँ उनकी आनन्दमयी सेवा में लगे रहने के लिए उनके दिव्य धाम में पहुँच सकता है।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥