श्रीमद् भागवतम
शब्द आकार

भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 31

 
श्लोक
आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम् ।
देवान् पितृनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाश्रमान् ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
आत्मानम्—स्वयं; च—भी; अनुशोचामि—शोक कर रही हूँ; भवन्तम्—आप; च—भी; अमर-उत्तमम्—देवताओं में श्रेष्ठ; देवान्—देवताओं के लिए; पितृन्—पितृलोक के निवासियों के लिए; ऋषीन्—ऋषियों के लिए; साधून्—भक्तों के लिए; सर्वान्—सभी; वर्णान्—जातियों के लिए; तथा—और; आश्रमान्—मानव समाज के चारों आश्रमों के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 हे देवताओं में श्रेष्ठ, मैं अपने विषय में तथा आपके विषय में और उसी के साथ ही साथ सभी देवताओं, ऋषियों, पितृलोक के निवासियों, भगवद्भक्तों तथा वर्णाश्रम-धर्म के पालक सभी मनुष्यों के विषय में सोच रही हूँ।
 
तात्पर्य
 मानव जीवन को पूर्ण बनाने में मनुष्यों, देवातओं, ऋषियों, पितृलोक के निवासियों, भगवद्भक्तों तथा वर्णाश्रम-धर्म की वैज्ञानिक पद्धति का योगदान रहता है। अतएव मानव जीवन तथा पशुजीवन में जो अन्तर है, वह वर्णाश्रम की वैज्ञानिक प्रणाली से प्रारम्भ होता है जिसका मार्गदर्शन देवताओं के लिए ऋषियों के अनुभव द्वारा होता है और जो धीरे-धीरे उठता हुआ परम पूर्ण सत्य, पूर्ण परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के साथ नित्य सम्बन्ध की स्थापना तक पहुँचता है। जब ईश्वरकृत वर्णाश्रम धर्म, जो पशु-चेतना का मानव-चेतना में और मानव-चेतना का ईश्वरीय-चेतना में विकास के निमित्त होता है, मूर्खों की प्रगति के द्वारा छिन्न कर दिया जाता है, जिससे शान्तिपूर्ण प्रगतिशील जीवन का सारा ढाँचा चरमरा जाता है। कलियुग में, विषधर सर्प का पहला आक्रमण ईश्वरकृत वर्णाश्रम धर्म पर होता है। फलस्वरूप योग्य ब्राह्मण शूद्र कहलाने लगता है और शूद्र की योग्यता वाला ब्राह्मण बन जाता है। यह सब जन्म के झूठे अधिकार से होता है। जन्म के दावे से ब्राह्मण बनना प्रामाणिक नहीं है, भले ही इससे किसी एक शर्त की पूर्ति होती हो। ब्राह्मण की असली योग्यता तो मन तथा इन्द्रियों को वश में करना तथा धैर्य, सरलता, स्वच्छता, ज्ञान, सत्य, भक्ति तथा वैदिक वाङ्मय के प्रति श्रद्धा करना इत्यादि है। आधुनिक युग में, आवश्यक योग्यता पर विचार नहीं किया जाता, यहाँ तक कि रामचरितमानस के अत्यन्त लोकप्रिय रचयिता द्वारा भी झूठे जन्म-अधिकार को समर्थन दिया जाता है।
यह सब कलियुग का प्रभाव है। अतएव गोरूप पृथ्वी माता दयनीय दशा पर शोक व्यक्त कर रही थीं।
____________________________
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥