श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा-
मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्र: ।
त्वां दु:स्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण
सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; वै—निश्चय ही; मम—मेरा; अति-भरम्—अत्यन्त बोझिल; आसुर-वंश—नास्तिक; राज्ञाम्—राजाओं का; अक्षौहिणी—एक अक्षौहिणी (एक अक्षौहिणी में २१,८७० रथ, इतने ही हाथी, १,०९,३५० पैदल सैनिक तथा ६५,६१० अश्वारोही होते हैं); शतम्—ऐसी सैकड़ों अक्षौहिणी; अपानुदत्—नष्ट कर डाली; आत्म-तन्त्र:—आत्म-निर्भर; त्वाम्—तुमको; दु:स्थम्—कठिनाई में डालकर; ऊन-पदम्—खड़े होने की शक्ति से रहित; आत्मनि—आन्तरिक; पौरुषेण—शक्ति के बल पर; सम्पादयन्—सम्पन्न करने के लिए; यदुषु—यदुवंश में; रम्यम्—दिव्य रूप से सुन्दर; अबिभ्रत्—स्वीकार किया; अङ्गम्—शरीर को ।.
 
अनुवाद
 
 हे धर्म-पुरुष, मैं नास्तिक राजाओं द्वारा नियोजित अत्यधिक सैन्य-समूह के भार से बोझिल हो उठी थी और अब भगवान् की कृपा से उससे उबर सकी हूँ। इसी प्रकार आप भी कष्टप्रद अवस्था में थे और खड़े भी नहीं हो सकते थे। इस तरह आपको भी उबारने के लिए यदुवंश में वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से अवतरित हुए थे।
 
तात्पर्य
 असुरगण दूसरे के सुख को लूटकर भी इन्द्रियतृप्ति का जीवन बिताना चाहते हैं। इस आकांक्षा की पूर्ति के लिए असुरगण, विशेषतया नास्तिक राजा या राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, अपने को अत्यन्त घातक अस्त्रों से सज्जित करके शान्तिपूर्ण समाज में युद्ध कराना चाहते हैं। उन्हें आत्मश्लाघा के अतिरिक्त जीवन में अन्य कोई अभिलाषा नहीं रहती। इस प्रकार पृथ्वी माता, सैन्यशक्ति में अत्यधिक वृद्धि के कारण अत्यधिक बोझिल अनुभव करती है। असुरों की वृद्धि होने से धर्मात्मा लोग, विशेषतया भक्त या देवता, दुखी होते हैं।

ऐसी परिस्थिति में, भगवान् इन अवांछित असुरों को नष्ट करने तथा धर्म की पुन:स्थापना करने के लिए अवतरित होते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण का यही उद्देश्य था और इसे उन्होंने पूरा किया।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥