श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 16: परीक्षित ने कलियुग का सत्कार किस तरह किया  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ।
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्यय: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
अथवा—अन्यथा; अस्य—उनका (भगवान् कृष्ण का); पद-अम्भोज—चरणकमल; मकरन्द-लिहाम्—कमल पुष्प के मधु को चाटनेवाले; सताम्—निरन्तर जीवित रहनेवालों के; किम् अन्यै:—अन्य किसी वस्तु से क्या लाभ; असत्—भ्रामक; आलापै:—विषय, प्रसंग; आयुष:—आयु में; यत्—जो है; असत्-व्यय:—जीवन का अपव्यय ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के भक्त भगवान् के चरणकमलों से प्राप्त मधु के चाटने के आदी हैं। उन कथा प्रसंगों से क्या लाभ जो मनुष्य के बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ नष्ट करें?
 
तात्पर्य
 भगवान् कृष्ण तथा उनके भक्त दोनों ही दिव्य स्तर पर रहते हैं, अतएव भगवान् कृष्ण तथा उनके शुद्ध भक्तों की कथाएँ समान रूप से उत्तम होती हैं। यद्यपि कुरुक्षेत्र का युद्ध राजनीति तथा कूटनीति से भरा हुआ है, परन्तु इसकी कथाएँ भगवान् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित हैं, अतएव भगवद्गीता सारे विश्व में पूजित है। राजनीति, अर्थशास्त्र या समाज विज्ञान जो संसारियों के लिए भौतिकतामय हों, उनके उच्छेदन की कोई आवश्यकता नहीं है। शुद्ध भक्त के लिए, जो वास्तव में भगवान् से जुड़ा है, ऐसी संसारी वस्तुएँ दिव्य होती हैं, यदि वे कृष्ण या उनके शुद्ध भक्तों के साथ जुड़ी हों। हम पाण्डवों के कार्यकलापों के सम्बन्ध में कह-सुन चुके हैं और अब हम महाराज परीक्षित की कथाओं के विषय में बातें कर रहे हैं, किन्तु ये सब कथाएँ भगवान् श्रीकृष्ण से सम्बन्धित हैं, अतएव ये सबकी सब दिव्य हैं और शुद्ध भक्त इन्हें बड़ी रुचि से सुनते हैं। हम इस बात को भीष्मदेव की स्तुतियों के प्रसंग में पहले ही बता चुके हैं।

हमारी आयु बहुत लम्बी नहीं होती और ऐसा भी कुछ निश्चित नहीं है कि हमें कब अगली मंजिल के लिए हर वस्तु को छोडऩे के लिए आदेश मिल जाँय। अतएव यह हमारा परम धर्म है कि हम कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी विषय में एक क्षण भी व्यर्थ न बिताएँ। कोई भी विषय कितना ही रोचक क्यों न हो, यदि वह कृष्ण से सम्बन्धित नहीं है, तो सुनने योग्य नहीं होता।

आध्यात्मिक ग्रह गोलोक वृन्दावन, जो भगवान् कृष्ण का सनातन धाम है, कमल पुष्प के गुच्छे के आकार का है। जब भगवान् किसी एक भौतिक ग्रह में भी अवतरित होते हैं, तब वे अपने निजी धाम को यथारूप में प्रकट करके ही ऐसा करते हैं। इस प्रकार उनके चरण सदैव उसी कमलदल के बड़े गुच्छे पर रहते हैं। उनके चरण कमल पुष्प के समान ही सुन्दर हैं, इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि भगवान् कृष्ण के पांव कमल-स्वरूप हैं।

जीव वैधानिक रूप से शाश्वत है। वह भौतिक शक्ति के सम्पर्क में रहने के कारण जन्म तथा मृत्यु के भँवर में पड़ा हुआ है। ऐसी भौतिक शक्ति से छूटने पर जीव मुक्त हो जाता है और भगवद्धाम जाने के योग्य बन जाता है। जो लोग अपना शरीर बदले बिना सदा-सदा के लिए जीवित रहना चाहते हैं, उन्हें कृष्ण तथा उनके भक्तों की कथाओं के अतिरिक्त अन्य किसी कथा में अपना बहुमूल्य समय नहीं गँवाना चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥