श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 1: सृष्टि  »  अध्याय 17: कलि को दण्ड तथा पुरस्कार  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
कोऽवृश्चत् तव पादांस्त्रीन् सौरभेय चतुष्पद ।
मा भूवंस्त्वाद‍ृशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनाम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
क:—वह कौन है; अवृश्चत्—काट लिया; तव—तुम्हारे; पादान्—पाँवों को; त्रीन्—तीन; सौरभेय—हे सुरभि पुत्र; चतु: पद—चौपाये हो; मा—कभी नहीं; भूवन्—ऐसा हुआ है; त्वादृशा:—जैसे कि तुम हो; राष्ट्रे—राज्य में; राज्ञाम्—राजाओं के; कृष्ण-अनुवर्तिनाम्—पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन करने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 उन्होंने (महाराज परीक्षित ने) बैल को बारम्बार सम्बोधित करते हुए इस तरह पूछा : हे सुरभि-पुत्र, तुम्हारे तीन पाँवों को किसने काट लिया है? उन राजाओं के राज्य में, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के नियमों के आज्ञाकारी हैं, तुम्हारे समान दुखी कोई नहीं है।
 
तात्पर्य
 समस्त राज्यों के राजाओं या प्रशासकों को भगवान् कृष्ण की संहिताएँ (सामान्यतया भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत ) जाननी चाहिए और उन्हीं के अनुसार मनुष्य को जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्म करना चाहिए, जिससे भौतिक जीवन के सारे कष्ट विनष्ट हो जाँय। जो मनुष्य भगवान् कृष्ण की संहिताओं को जानता है, उसे यह गति बिना कष्ट के मिल सकती है। भगवद्गीता में, संक्षेप में, हम ईश्वर की संहिताएँ समझ सकते हैं, और श्रीमद्भागवत में उनकी विस्तृत व्याख्या हुई है।

जिस राज्य में कृष्ण के आदेशों का पालन किया जाता है, वहाँ कोई दुखी नहीं रहता। जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ प्रथम लक्षण यह है कि धर्म के प्रतिनिधि के तीन पाँव कट जाते हैं; फिर कष्टों की झड़ी लग जाती है। जब कृष्ण साक्षात् विद्यमान थे तो इन आदेशों का, निस्सन्देह, पालन होता था, किन्तु उनकी अनुपस्थिति में ऐसे अन्धे लोगों के लिए, जो उच्चपद पर निहित हैं, श्रीमद्भागवत के पृष्ठों में उन्हें अंकित कर दिया गया है।

 
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